एग्रीवेट: Mustard Farming: रबी सीजन में सरसों की खेती किसानों के लिए अच्छी कमाई का विकल्प बन सकती है. अगर किसान अधिक उत्पादन के साथ कम सिंचाई वाली किस्म की तलाश कर रहे हैं, तो चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU), हिसार की विकसित सरसों की किस्म ‘आरएच 725’ उनके लिए उपयोगी साबित हो सकती है. इस किस्म की औसत पैदावार 25 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई जाती है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों और वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर उत्पादन 36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकता है. इसकी लंबी फलियां, मोटे दाने और अच्छी तेल मात्रा इसे खास बनाते हैं. आइए जानते हैं इस किस्म की प्रमुख विशेषताएं और खेती से जुड़ी जरूरी बातें.
सरसों की खेती में बेहतर पैदावार किसानों की आमदनी बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है. आरएच 725 किस्म से सामान्य परिस्थितियों में 25 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक औसत उपज मिलने का दावा किया जाता है. वहीं, समय पर बुवाई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, उचित सिंचाई और फसल की वैज्ञानिक तरीके से देखभाल करने पर इसकी पैदावार 36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है. हालांकि, वास्तविक उत्पादन मिट्टी की गुणवत्ता, मौसम, बीज की गुणवत्ता और खेती के प्रबंधन पर निर्भर करता है. इसलिए किसानों को अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुसार कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेकर खेती करनी चाहिए.
आरएच 725 सरसों की पहचान इसकी पौधों की बनावट और फलियों से की जा सकती है. इस किस्म में फलियां लंबी और मोटी होती हैं. इनमें प्रति फली लगभग 17 से 20 दाने होने की जानकारी दी जाती है. इसके बीज भी आकार में मोटे और वजनदार होते हैं. पौधों का तना मजबूत होने के कारण फसल के गिरने की आशंका कम हो सकती है. यह विशेषता किसानों के लिए फायदेमंद है, क्योंकि फसल के गिरने से कटाई में परेशानी और उत्पादन में नुकसान होने की आशंका रहती है. हालांकि, तेज हवाओं, बारिश और फसल की स्थिति के आधार पर गिरने का जोखिम बना रह सकता है.
सरसों की खेती में तेल की मात्रा का विशेष महत्व है. अधिक तेल वाली उपज को बाजार में अच्छा मूल्य मिलने की संभावना रहती है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आरएच 725 किस्म में तेल की मात्रा लगभग 40 से 42 प्रतिशत तक हो सकती है. इससे खाद्य तेल उत्पादन के लिहाज से यह किस्म किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है. हालांकि, सरसों का वास्तविक बाजार भाव केवल तेल की मात्रा पर निर्भर नहीं करता. इसमें मंडी की मांग, गुणवत्ता, नमी और सरकार की खरीद व्यवस्था जैसे कारक भी अहम होते हैं. इसलिए किसानों को बुवाई से पहले अपने क्षेत्र में बीज की उपलब्धता और बाजार की स्थिति की जानकारी लेनी चाहिए.
आरएच 725 किस्म को समय पर बुवाई और वर्षा आधारित यानी बारानी परिस्थितियों के लिए उपयुक्त बताया जाता है. इसकी फसल में परिस्थितियों के अनुसार एक से दो सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है. हालांकि, सिंचाई की वास्तविक आवश्यकता मिट्टी में नमी, मौसम और फसल की अवस्था पर निर्भर करेगी. दक्षिणी हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, जम्मू और उत्तरी राजस्थान जैसे क्षेत्रों में सरसों की खेती करने वाले किसान इस किस्म पर विचार कर सकते हैं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इसकी बुवाई के लिए 25 सितंबर से 20 अक्टूबर का समय बताया गया है. लेकिन बुवाई की सही अवधि स्थानीय जलवायु और कृषि विश्वविद्यालय की क्षेत्र-विशिष्ट सलाह के अनुसार तय करनी चाहिए. किसानों को अच्छी पैदावार के लिए प्रमाणित बीज का इस्तेमाल, खेत में उचित नमी, संतुलित खाद और समय पर खरपतवार व कीट प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए. इन उपायों से फसल की उत्पादकता बेहतर करने में मदद मिल सकती है.