भारत का अन्न भंडार बफर मानकों से करीब दोगुना, वैश्विक खाद्य संकट के बीच किसानों के लिए सुरक्षा कवच – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 09 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: भारत का अन्न भंडार बफर मानकों से करीब दोगुना, वैश्विक खाद्य संकट के बीच किसानों के लिए सुरक्षा कवच – भारत का गेहूं-चावल भंडार तय बफर मानकों से लगभग दोगुना अधिक है, जो उर्वरक महंगाई और वैश्विक खाद्य सुरक्षा जोखिमों के बीच किसानों के लिए राहत की बात है।

नई दिल्ली, 8 अक्टूबर। देश के सरकारी गोदामों में गेहूं और चावल का भंडार तय बफर मानकों से लगभग दोगुना ज्यादा है। केंद्र सरकार के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक यह अतिरिक्त भंडार तब काम आ रहा है, जब दुनिया भर में उर्वरक की ऊंची कीमतों और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण खाद्य सुरक्षा पर जोखिम गहरा रहा है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की रबी फसलों पर मूल्य नीति रिपोर्ट और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के आंकड़ों के मुताबिक 1 जुलाई 2026 को केंद्रीय पूल में गेहूं और चावल मिलाकर 925.85 लाख मीट्रिक टन का भंडार था, जबकि इसके लिए तय मानक 411.20 लाख मीट्रिक टन है। यानी ज़रूरत से करीब 514.65 लाख मीट्रिक टन ज्यादा अनाज गोदामों में मौजूद था। इसमें गेहूं का हिस्सा 522.74 लाख मीट्रिक टन और चावल का हिस्सा 403.11 लाख मीट्रिक टन रहा।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में उर्वरक की बढ़ती कीमतों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आ रही दिक्कतों को वैश्विक खाद्य सुरक्षा के सामने बड़ी चुनौती बताया है। सीएसीपी की रिपोर्ट में भी भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन में रुकावटों को कृषि जिंसों के बाजार में अस्थिरता की वजह बताया गया है।

1 सितंबर 2026 को केंद्रीय पूल में भंडार 870.45 लाख मीट्रिक टन था, जिसमें गेहूं 479.92 लाख मीट्रिक टन और चावल 390.53 लाख मीट्रिक टन शामिल था। यह 1 अक्टूबर के लिए तय मानक 307.70 लाख मीट्रिक टन से करीब 2.8 गुना ज्यादा है। इसके अलावा 307.51 लाख मीट्रिक टन बिना मिला हुआ धान भी एफसीआई और राज्य एजेंसियों के पास मौजूद था।

बफर मानक इसलिए तय किए जाते हैं कि राशन दुकानों और अन्य सरकारी योजनाओं के लिए अनाज की सप्लाई कभी बाधित न हो, और बाजार में अचानक कीमतें न बढ़ें। सीएसीपी वही संस्था है जो हर साल फसलों की एमएसपी तय करने से पहले सरकार को सिफारिश भेजती है। कुछ दिन पहले ही सरकार ने रबी सीजन 2027-28 के लिए गेहूं समेत छह फसलों की एमएसपी में बढ़ोतरी को मंजूरी दी थी।

1 जुलाई 2025 की तुलना में इस साल गेहूं-चावल का कुल भंडार करीब 26 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि गेहूं का भंडार अकेले करीब 46 प्रतिशत ज्यादा है। साल 2025-26 में गेहूं का उत्पादन 120.7 मिलियन टन अनुमानित है, जो 2024-25 के 110.6 मिलियन टन से अधिक है।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक जरूरत पड़ने पर खुले बाजार बिक्री योजना के तहत एफसीआई बाजार में अतिरिक्त अनाज उतार सकती है, ताकि घरेलू कीमतों पर असर न पड़े। सूत्रों ने यह भी कहा कि अनाज की मौजूदा स्थिति का बोझ आम किसानों पर नहीं पड़ने दिया जाएगा। कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इतना बड़ा भंडार भंडारण और रखरखाव की लागत भी बढ़ाता है, इसलिए आने वाले महीनों में इसका एक हिस्सा खुले बाजार में उतारा जा सकता है।

देश में हर साल रबी और खरीफ सीजन की सरकारी खरीद का सीधा संबंध इन्हीं बफर स्टॉक के आंकड़ों से जुड़ा होता है। जब गोदामों में अनाज ज्यादा होता है, तो सरकार पर नई फसल की खरीद और उसके रखरखाव का दबाव भी बढ़ जाता है। यही वजह है कि हाल ही में सरकार ने 2027-28 के मार्केटिंग सीजन के लिए गेहूं समेत छह रबी फसलों की एमएसपी में बढ़ोतरी को मंजूरी दी थी, जिसमें गेहूं का समर्थन मूल्य ₹2,610 प्रति क्विंटल तय किया गया है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि भंडार भले ही ज्यादा हो, लेकिन इससे किसानों को मिलने वाले एमएसपी पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि खरीद प्रक्रिया पहले से तय मानकों के अनुसार ही चलती है।

उर्वरक की वैश्विक कीमतों में उछाल की एक वजह कोविड-19 के बाद से लगातार बढ़ती लागत भी है। हाल के महीनों में यूरिया के आयात सौदे 935 से 959 डॉलर प्रति टन की दर पर हुए हैं, जबकि एक साल पहले यह दर 410 से 420 डॉलर प्रति टन के आसपास थी। ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन से भारत को उसके कुल यूरिया आयात का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा मिलता है, इसलिए खाड़ी क्षेत्र में किसी भी तनाव का सीधा असर उर्वरक की सप्लाई और कीमत पर पड़ता है।

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