एग्रीवेट: 26 सितंबर 2026, नई दिल्ली: वाटरशेड परियोजनाओं की मंजूरी अब सिर्फ 3 महीने में, केंद्र ने बनाई नई तकनीकी गाइडलाइन – देश के वर्षा आधारित (असिंचित) खेती वाले इलाकों में जलग्रहण क्षेत्र यानी वाटरशेड विकास परियोजनाओं को अब मंजूरी मिलने में पहले से आधा समय लगेगा। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अधीन काम करने वाले राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) ने 22 सितंबर को नई दिल्ली के एनएएससी कॉम्प्लेक्स में हुई एक उच्चस्तरीय तकनीकी बैठक में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार करने और मंजूर करने की समयसीमा 6 महीने से घटाकर 3 महीने करने पर सहमति बनाई है।
यह बैठक विश्व बैंक की मदद से चल रहे रिवॉर्ड कार्यक्रम (रिजुविनेटिंग वाटरशेड्स फॉर एग्रीकल्चरल रेजिलिएंस थ्रू इनोवेटिव डेवलपमेंट) के तहत आयोजित की गई थी। इसका मकसद देशभर में वाटरशेड प्रबंधन के लिए बनाई जा रही नई राष्ट्रीय तकनीकी गाइडलाइन (एनटीजी) की समीक्षा और उसे अंतिम रूप देना था। बैठक की अध्यक्षता एनआरएए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्र शेखर कुमार ने की।
बैठक में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के उप महानिदेशक डॉ. ए.के. नायक, भूमि संसाधन विभाग के संयुक्त सचिव नितिन खाड़े और ओडिशा सरकार के नोडल प्रतिनिधि डॉ. सुब्रत पांडा सहित करीब 45 वैज्ञानिक, राज्य स्तरीय नोडल एजेंसियों के अधिकारी, विश्वविद्यालय और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसमें कर्नाटक के अधिकारी भी मौजूद रहे।
चर्चा के दौरान डॉ. नायक ने जोर दिया कि नई गाइडलाइन में नतीजों तक पहुंचने की कार्यप्रणाली को साफ-साफ लिखा जाना चाहिए, ताकि भूमि संसाधन इन्वेंट्री और हाइड्रोलॉजी यानी जल विज्ञान से जुड़े आंकड़ों को बेहतर ढंग से जोड़ा जा सके। बैठक में तय हुआ कि सभी पक्षों के लिए एक साझा निर्णय सहायता प्रणाली यानी डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) बनाई जाएगी, साथ ही एक अलग वेब पोर्टल भी विकसित किया जाएगा जिससे वाटरशेड परियोजनाओं की निगरानी और डेटा साझा करना आसान हो सके। ओडिशा और कर्नाटक को नई गाइडलाइन के लिए अपने राज्यों का वाटरशेड और हाइड्रोलॉजी डेटा साझा करने को कहा गया है।
देश के बड़े हिस्से में आज भी खेती पूरी तरह बारिश के भरोसे होती है, और ऐसे इलाकों में वाटरशेड परियोजनाएं ही मिट्टी में नमी बचाने, भूजल स्तर बढ़ाने और सूखे के असर को कम करने का सबसे बड़ा जरिया मानी जाती हैं। अभी तक डीपीआर बनने और मंजूर होने में लगने वाला लंबा समय कई राज्यों में परियोजनाओं की शुरुआत में देरी की बड़ी वजह रहा है, जिससे चेक डैम, तालाब गहरीकरण, कंटूर बंडिंग और मिट्टी संरक्षण जैसे काम कई बार सालों तक टलते रहे हैं।
राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण की स्थापना केंद्र सरकार ने खासतौर पर असिंचित व वर्षा आधारित खेती वाले इलाकों के लिए नीतियां बनाने और राज्यों के वाटरशेड कार्यक्रमों में तालमेल बिठाने के मकसद से की थी। रिवॉर्ड कार्यक्रम इसी दिशा में विश्व बैंक की मदद से चलाई जा रही एक बड़ी पहल है, जिसका लक्ष्य पुराने और बिगड़ चुके जलग्रहण क्षेत्रों को फिर से जीवंत करना है।
अगर डीपीआर मंजूरी की समयसीमा वाकई घटकर 3 महीने रह जाती है, तो असिंचित इलाकों के किसानों तक जल संरक्षण ढांचे का लाभ पहले की तुलना में कहीं तेजी से पहुंच सकेगा। नया डेटा सहायता सिस्टम और वेब पोर्टल राज्यों के बीच पारदर्शिता भी बढ़ाएगा, जिससे केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर परियोजनाओं की प्रगति पर सीधी नजर रखी जा सकेगी। ओडिशा और कर्नाटक से मांगा गया डेटा आने वाले महीनों में इस गाइडलाइन को अंतिम रूप देने में मदद करेगा, जिसके बाद इसे बाकी राज्यों में भी लागू किए जाने की उम्मीद है।
यह खबर पीआईबी से जुड़ी मानी जा रही रिपोर्ट पर आधारित है, हालांकि मूल पीआईबी विज्ञप्ति का सीधा लिंक उपलब्ध नहीं हो सका; तीन स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टों — ग्लोबल एग्रीकल्चर, रिवोई इंग्लिश और केएनएन इंडिया — में तथ्य और आंकड़े एक जैसे पाए गए हैं, जो सभी 22 सितंबर की बैठक के अगले दिन 23 सितंबर को प्रकाशित हुई हैं।