एग्रीवेट: देश आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 157वीं जयंती मना रहा है. इस खास मौके पर राजधानी नई दिल्ली स्थित उनके समाधि स्थल ‘राजघाट’ पर विशेष श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बापू को नमन कर पुष्पांजलि अर्पित करेंगे. हर साल 2 अक्टूबर को देशभर के स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी संस्थानों में बापू के सत्य और अहिंसा के विचारों को याद किया जाता है. आमतौर पर दुनिया महात्मा गांधी को एक महान स्वतंत्रता सेनानी और अहिंसा के पुजारी के रूप में देखती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वे देश के किसानों के भी बहुत बड़े हितैषी थे. भारत की धरती पर उनका पहला बड़ा सत्याग्रह ‘चंपारण का नील आंदोलन’ ही था, जिसने उन्हें पूरे देश का सर्वमान्य नेता बना दिया. आइए, गांधी जयंती के इस अवसर पर जानते हैं बापू के ऐतिहासिक नील आंदोलन और दांडी मार्च की पूरी कहानी.
10 अप्रैल 1917 को भारत की आजादी की लड़ाई का पहला ‘सत्याग्रह’ शुरू हुआ, जिसे चंपारण सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है. इस आंदोलन की सबसे खास बात यह थी कि इसमें न तो कोई हिंसा हुई, न लाठियां चलीं और न ही कोई बड़ी जनसभा बुलाई गई. जब गांधी जी को गिरफ्तार किया गया, तो उन्होंने जमानत लेने तक से इनकार कर दिया. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यह सत्याग्रह इतना असरदार साबित हुआ कि ब्रिटिश सरकार को किसानों की मांगें माननी पड़ीं और कई अत्याचारी अंग्रेज अधिकारियों को वापस लंदन भागना पड़ा. इसी ऐतिहासिक आंदोलन की सफलता ने बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी को देशवासियों का ‘महात्मा’ और आगे चलकर ‘राष्ट्रपिता’ बना दिया.
दरअसल, प्रथम विश्व युद्ध के दौर में बिहार का चंपारण क्षेत्र अंग्रेजों के भीषण शोषण से तड़प रहा था. यहां के किसानों पर ब्रिटिश सरकार ने ‘तिनकठिया’ कानून थोप रखा था, जिसके तहत हर किसान को अपनी जमीन के एक बीघा में से कम से कम तीन कट्ठा हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था. किसान अपनी मर्ज़ी से यह भी तय नहीं कर सकते थे कि जमीन के किस हिस्से में बुवाई होगी. नील की फसल उगाकर जहां एक तरफ खेतों की उपजाऊ क्षमता हमेशा के लिए खत्म हो रही थी, वहीं दूसरी तरफ किसानों को इसकी बेहद कम कीमत मिलती थी. नियम के मुताबिक प्रति बीघा मिलने वाले 19 रुपये भी किसानों तक पूरे नहीं पहुंचते थे और नुकसान की भरपाई का कोई रास्ता नहीं था. कम दाम और बर्बादी के बावजूद किसान नील उगाने को मजबूर थे और ऊपर से अंग्रेज प्रशासन उन पर तरह-तरह के भारी टैक्स वसूल कर उनकी कमर तोड़ रहा था.
कहा जाता है कि पहला विश्व युद्ध शुरू होने पर अंग्रेजों को ज्यादा पैसों की जरूरत पड़ी, तो उन्होंने चंपारण के किसानों पर जबरन नील की खेती करने का दबाव और बढ़ा दिया. मना करने वाले किसानों की बेरहमी से पिटाई की जाती थी. हालांकि 1914 में किसानों ने एकजुट होकर अदालत से कुछ करों में राहत हासिल की, लेकिन कारखानों के मालिकों ने सिंचाई जैसे नए कर वसूलना शुरू कर दिए. इससे पहले 1859 में बंगाल के किसान भी ‘नील विद्रोह’ कर चुके थे, फिर भी किसानों की दुर्दशा खत्म नहीं हुई. कर्ज, बंजर होती जमीन और भुखमरी के कारण किसान बेबस थे और उन्हें एक ऐसे नेतृत्व की तलाश थी जो उनकी आवाज बन सके. वहीं दूसरी ओर महात्मा गांधी भी अपने ‘सत्याग्रह’ के विचार को आजमाने के लिए एक सही मंच की तलाश में थे.
इसी दौरान चंपारण के एक साधारण किसान राजकुमार शुक्ल ने अंग्रेजों के इस अत्याचार के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई. बार-बार जेल जाने के बावजूद जब उनका विरोध नहीं रुका, तो अंग्रेजों ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर इनाम तक घोषित कर दिया. ऐसे मुश्किल दौर में चंपारण को गांधी की और गांधी को चंपारण जैसे हालात की जरूरत थी, ताकि शोषण के खिलाफ अहिंसा का बड़ा आंदोलन शुरू किया जा सके. जब अंग्रेजों के अत्याचारों से तंग आकर चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल ने महात्मा गांधी को बिहार आमंत्रित किया, तब गांधी जी चंपारण के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. लेकिन किसानों का दर्द देखकर वे 10 अप्रैल 1917 को मुजफ्फरपुर पहुंचे. अंग्रेजी प्रशासन ने उन्हें तुरंत जिला छोड़ने का आदेश दिया, जिसे गांधी जी ने साफ खारिज कर दिया.
अदालत में पेशी के दौरान जब गांधी जी ने निडरता से कहा कि वे किसानों की मदद के लिए किसी भी सजा को भुगतने के लिए तैयार हैं, तो मजिस्ट्रेट हैरान रह गया. प्रथम विश्व युद्ध के माहौल में घबराई ब्रिटिश सरकार को आखिरकार झुकना पड़ा और गांधी जी पर दर्ज केस वापस ले लिया गया. गांधी जी ने मीडिया की दखल के बिना गांव-गांव घूमकर हजारों किसानों के बयान दर्ज किए. इस दबाव में प्रांतीय सरकार ने एक जांच समिति बनाई, जिसमें गांधी जी भी शामिल हुए. समिति की सिफारिश पर सौ साल पुरानी शोषक ‘तिनकठिया प्रथा’ को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया और किसानों से वसूला गया 25 प्रतिशत अवैध धन लौटाया गया. सत्याग्रह की इस अभूतपूर्व सफलता ने अंग्रेजों की नींव हिला दी और इसी आंदोलन ने मोहनदास करमचंद गांधी को देश का सर्वमान्य नेता ‘महात्मा’ बना दिया.
इसी तरह महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से दांडी के समुद्र तट तक अपनी ऐतिहासिक यात्रा शुरू की थी, जिसे ‘दांडी मार्च’ के नाम से जाना जाता है. उस समय ब्रिटिश सरकार का नमक बनाने और बेचने पर पूरा नियंत्रण था और हर नागरिक को नमक पर टैक्स देना पड़ता था. गांधी जी का मानना था कि नमक जैसी बुनियादी चीज पर टैक्स लगाना बेहद अन्यायपूर्ण है. उनका कहना था कि अगर आज सरकार नमक पर टैक्स लगा रही है, तो कल यह पानी पर भी टैक्स वसूलने लगेगी. इस मुद्दे की सबसे बड़ी बात यह थी कि देश का सबसे गरीब और अनपढ़ किसान भी नमक टैक्स की इस नाइंसाफी को बहुत आसानी से समझ सकता था.
अंग्रेजों का कानून इतना सख्त था कि समुद्र किनारे रहने वाले लोग भी अगर रेत पर पड़ा मुट्ठी भर नमक उठा लेते, तो उन पर भारी जुर्माना लगा दिया जाता था. इसी अन्याय को चुनौती देने के लिए गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की और दांडी तट पर जाकर खुद नमक बनाने का फैसला किया. यह दांडी मार्च 12 मार्च को शुरू होकर 5 अप्रैल 1930 को खत्म हुआ. इस यात्रा के दौरान सत्याग्रहियों ने 25 दिनों तक रोजाना करीब 24 किलोमीटर पैदल चलकर कुल 400 किलोमीटर की दूरी तय की. इस मार्च में देश के हर कोने से आए लोग शामिल थे, जिनमें 60 वर्ष के महात्मा गांधी सबसे उम्रदराज सत्याग्रही थे.