तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई में एकीकृत खेती से किसान की सालाना कमाई 38 लाख रुपये पार – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 01 अक्टूबर2026, पुदुक्कोट्टई (तमिलनाडु): तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई में एकीकृत खेती से किसान की सालाना कमाई 38 लाख रुपये पार – तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई जिले के नम्बुकुझी गांव में रहने वाले किसान ए. सुब्रमण्यम ने रासायनिक खेती छोड़कर एकीकृत जैविक खेती का रास्ता चुना और आज वे सालाना करीब 38.74 लाख रुपये की आय कमा रहे हैं। इसमें से करीब 28 लाख रुपये शुद्ध मुनाफा है।

सुब्रमण्यम अपने 30 एकड़ खेत में एक साथ नारियल, धान, तिल, उड़द, कालीमिर्च और सब्जियां उगाते हैं। इसके साथ ही वे देशी नस्ल की गायें, देशी मुर्गियां, बकरी, हंस और मछली पालन भी करते हैं, जिससे उनकी आय के कई स्रोत बन गए हैं।

सुब्रमण्यम बताते हैं कि करीब 10 साल पहले एक ट्रेन यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात एक किसान परिवार से हुई थी, जिनके परिवार के एक सदस्य को रासायनिक कीटनाशकों के लगातार इस्तेमाल से कैंसर हो गया था। इस घटना ने उन्हें झकझोर दिया और उन्होंने उसी समय जैविक व एकीकृत खेती अपनाने का फैसला किया।

उनका मानना है, “एक का कचरा दूसरे का भोजन है।” यही सोच उनकी पूरी खेती का आधार है — गोबर और पशु अपशिष्ट खाद बनाने में इस्तेमाल होता है, फसल अवशेष पशुओं के चारे में और तालाब का पानी मछली व सिंचाई दोनों में काम आता है।

उनके 13 एकड़ में लगे करीब 890 नारियल पेड़ों से ही उन्हें सालाना करीब 26 लाख रुपये की आय होती है। इसके अलावा 7 एकड़ में देशी धान की खेती से करीब 4.41 लाख रुपये और दूध बेचने से करीब 1.8 लाख रुपये की कमाई होती है। बाकी आय तिल, उड़द, कालीमिर्च, सब्जी, मुर्गी, बकरी, हंस और मछली पालन से मिलकर बनती है।

सुब्रमण्यम के खेत में 50 कांकेयम नस्ल की देशी गायें भी हैं, जो तमिलनाडु की पारंपरिक और सूखा-सहनशील नस्ल मानी जाती हैं। इनके गोबर और मूत्र से बनने वाली जैविक खाद और कीटनाशक ही उनके पूरे खेत में इस्तेमाल होते हैं, जिससे बाहर से खाद-दवा खरीदने का खर्च लगभग खत्म हो गया है।

खेत में 200 देशी मुर्गियां भी पाली जाती हैं, जो कीट-पतंगे खाकर फसल को कीटों से बचाने में मदद करती हैं और साथ ही अंडे-मांस से अतिरिक्त आय भी देती हैं। तालाब में मछली पालन से न सिर्फ आय मिलती है, बल्कि तालाब का पानी सूखे की स्थिति में सिंचाई के काम भी आता है।

उनके इस मॉडल को देखते हुए तमिलनाडु सरकार ने 2026 में उन्हें “नम्मालवार पुरस्कार” से सम्मानित किया, जिसमें 2 लाख रुपये की नकद राशि और पदक शामिल है। यह पुरस्कार राज्य में जैविक व प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाले किसानों को दिया जाता है और इसका नाम तमिलनाडु में जैविक खेती आंदोलन के अग्रणी माने जाने वाले जी. नम्मालवार के नाम पर रखा गया है।

इस समारोह में सुब्रमण्यम के साथ राज्य के दो अन्य किसानों को भी जैविक व प्राकृतिक खेती में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इससे साफ है कि राज्य सरकार अब रासायनिक खेती से हटकर टिकाऊ खेती मॉडल अपनाने वाले किसानों को खुलकर प्रोत्साहित कर रही है।

कई फसलों और पशुपालन को एक साथ जोड़ने वाला उनका यह मॉडल दिखाता है कि किसी एक फसल पर पूरी तरह निर्भर न रहकर आय के कई जरिए बनाए जाएं, तो मौसम की मार या बाजार भाव गिरने पर भी नुकसान सीमित रहता है। सुब्रमण्यम की कहानी उन किसानों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण है जो अकेली नकदी फसल पर निर्भर रहने से बचना चाहते हैं, क्योंकि यह मॉडल किसी एक फसल की कीमत गिरने पर भी किसान का पूरा नुकसान नहीं होने देता।

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