एग्रीवेट: 30 सितंबर 2026, अलवर: अलवर के महेंद्र ने पॉलीहाउस में खीरे की खेती से बदली तस्वीर, 10 परिवारों को मिला रोजगार – अलवर जिले के गुजुकी गांव के किसान महेंद्र ने परंपरागत खेती छोड़कर संरक्षित खेती (प्रोटेक्टेड कल्टिवेशन) की राह पकड़ी और आज वे क्षेत्र के हाईटेक किसानों में गिने जाते हैं। साल 2012 में उन्होंने यह सफर शुरू किया था, और आज उनके पास तीन एकड़ में फैला पॉलीहाउस व शेडनेट हाउस है।
महेंद्र के खेत में दो एकड़ में पॉलीहाउस और एक एकड़ में शेडनेट हाउस लगा है, जिसमें मुख्य रूप से खीरे की खेती होती है। इसके साथ-साथ वे शिमला मिर्च, टमाटर, स्ट्रॉबेरी, गोभी और बैंगन जैसी फसलें भी उगाते हैं, ताकि साल भर अलग-अलग फसलों से आमदनी का जरिया बना रहे और मंडी में किसी एक फसल के भाव गिरने का जोखिम भी कम हो।
क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार महेंद्र के पॉलीहाउस में खीरे का उत्पादन प्रति एकड़ अधिकतम 80 टन तक पहुंच चुका है, जो परंपरागत खुले खेत की खेती के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। इस खेती में सिंचाई के लिए ड्रिप पद्धति अपनाई गई है, जबकि उर्वरक के तौर पर जीवामृत, देसी खाद और बायोगैस स्लरी का इस्तेमाल किया जाता है।
इस उत्पादन के लिए साल भर मेहनत चाहिए, और यही वजह है कि महेंद्र के खेत पर 8 से 10 परिवारों को नियमित रोजगार मिल रहा है। उनकी इस उपलब्धि को देखते हुए कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (आत्मा) की ओर से उन्हें “कृषक सम्मान पुरस्कार” से सम्मानित किया गया है।
महेंद्र का कहना है, “अपने खेत की मिट्टी और पानी की वैज्ञानिक जांच करवाएं तथा स्थानीय मंडी की मांग समझें।” यह सलाह वे नए किसानों को संरक्षित खेती अपनाने से पहले देते हैं, ताकि वे सही फसल और सही तकनीक का चुनाव कर सकें।
पॉलीहाउस और शेडनेट हाउस के भीतर तापमान, नमी और रोशनी को काफी हद तक नियंत्रित रखा जा सकता है, जिससे फसल पर मौसम की अनिश्चितता का असर कम पड़ता है। बारिश, ओलावृष्टि या तेज धूप से सीधे नुकसान की आशंका घट जाती है, और कीट-रोग का प्रकोप भी खुले खेत के मुकाबले कम होता है। यही वजह है कि खीरा, शिमला मिर्च और स्ट्रॉबेरी जैसी संवेदनशील फसलों में पॉलीहाउस तकनीक तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है, भले ही शुरुआती ढांचा खड़ा करने की लागत खुले खेत से ज्यादा हो।
महेंद्र ने अपनी शुरुआत एक छोटे पॉलीहाउस से की थी। धीरे-धीरे मुनाफा बढ़ने के साथ उन्होंने रकबा बढ़ाया और आज तीन एकड़ में संरक्षित खेती कर रहे हैं। स्पष्ट कर दें कि उपलब्ध रिपोर्ट में उनकी सालाना आय का सटीक रुपए का आंकड़ा नहीं दिया गया है, इसलिए यहां सिर्फ उत्पादन और रोजगार से जुड़े पुष्ट आंकड़े ही शामिल किए गए हैं।