जम्मू-कश्मीर के सेब किसानों की बढ़ी चिंता, NAFED की सरकारी खरीद बंद, अब बाजार भाव का जोखिम – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: एप्पल Procurement Jammu Kashmir: जम्मू-कश्मीर के सेब किसानों के सामने इस सीजन में फसल बेचने को लेकर नई चिंता खड़ी हो गई है. मार्केट इंटरवेंशन स्कीम यानी एमआईएस के तहत नेफेड की सरकारी खरीद बंद होने के बाद किसानों को अब मुख्य रूप से आढ़तियों, निजी कारोबारियों और थोक मंडियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है. अगर बाजार में सेब के दाम नीचे आते हैं तो सबसे ज्यादा परेशानी छोटे और सीमांत किसानों को हो सकती है. किसान संगठनों का कहना है कि सरकारी खरीद की व्यवस्था कमजोर बाजार के समय किसानों के लिए एक सहारा थी.

जम्मू-कश्मीर में सेब खरीदने के लिए मार्केट इंटरवेंशन स्कीम की शुरुआत सितंबर 2019 में हुई थी. उस समय घाटी में आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा था और सेब को दूसरे राज्यों के बाजारों तक पहुंचाने में भी किसानों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा था. इस योजना के तहत नेफेड तय केंद्रों पर किसानों से सीधे सेब खरीदता था. इसमें जम्मू-कश्मीर का योजना एवं विपणन निदेशालय और जम्मू-कश्मीर हॉर्टिकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग एंड प्रोसेसिंग कॉरपोरेशन भी शामिल था. खरीदे गए सेब का भुगतान सीधे किसानों के बैंक खातों में किया जाता था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 28 जनवरी 2020 तक नेफेड ने किसानों से 15,769 टन सेब खरीदा था. इस खरीद की कीमत करीब 70.45 करोड़ रुपये थी.

योजना को 2020-21 में भी जारी रखा गया था. उस समय नेफेड को 12 लाख टन तक सेब खरीदने की अनुमति दी गई थी. इसके लिए केंद्र सरकार ने 2,500 करोड़ रुपये की गारंटी भी दी थी. योजना में खरीद के दौरान होने वाले नुकसान को केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के बीच बराबर यानी 50:50 के अनुपात में बांटने का प्रावधान था. इससे बाजार में दाम कमजोर होने पर सरकारी खरीद के जरिए किसानों को एक वैकल्पिक रास्ता मिलता था.

सरकारी खरीद का एक फायदा यह भी था कि किसानों के पास अपनी फसल बेचने का एक और विकल्प रहता था. बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार फल मंडी शोपियां के अध्यक्ष मोहम्मद अशरफ वानी ने बताया कि, सीधे खरीद की व्यवस्था से किसानों की बिचौलियों पर निर्भरता कम हुई थी. नेफेड के जरिए खरीद होने पर किसानों को सीधे बैंक खाते में भुगतान मिलता था. इससे कारोबारियों की ओर से भुगतान में देरी या रकम काटे जाने जैसी आशंकाएं भी कम होती थीं. अब यह व्यवस्था खत्म होने के बाद किसानों को निजी कारोबारियों और थोक मंडियों पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है.

सेब का भाव अब बाजार की मांग, फल की क्वालिटी, ग्रेड और मंडियों में एक साथ पहुंचने वाली फसल की मात्रा जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा. अगर किसी समय बाजार में सेब की आवक ज्यादा हो गई और मांग कम रही तो दाम गिर सकते हैं. किसान प्रतिनिधियों का कहना है कि ऐसी स्थिति में छोटे किसानों के पास इंतजार करने की गुंजाइश कम होती है. उन्हें भंडारण और फसल को लंबे समय तक रोककर रखने की सुविधा सीमित होने के कारण जल्दी बिक्री करनी पड़ सकती है. रिपोर्ट के अनुसार ऑल इंडिया किसान सभा, जम्मू-कश्मीर के अध्यक्ष गुलाम मोहम्मद भट ने दावा किया है कि कम ग्रेड वाले सेब में स्थानीय खरीद और दूसरे राज्यों की थोक मंडियों के भाव में अंतर देखा जाता है. यह किसान प्रतिनिधि का दावा है.

जम्मू-कश्मीर में सेब की खेती किसानों की आय का एक बड़ा जरिया है. यहां हर साल करीब 20 लाख टन सेब का उत्पादन होता है और इससे बड़ी संख्या में लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है. ऐसे में सरकारी खरीद बंद होने के बाद किसानों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर बाजार भाव अचानक गिर गया तो उनकी फसल का क्या होगा. किसान संगठनों की मांग है कि कमजोर बाजार की स्थिति में किसानों को राहत देने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाए, ताकि उन्हें मजबूरी में कम कीमत पर अपनी फसल न बेचनी पड़े.

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