एग्रीवेट: 26 सितंबर 2026, लखनऊ: 90 दिन में तैयार होने वाली तोरिया बनी किसानों के लिए कमाई का नया विकल्प – खरीफ फसलों की कटाई के बाद किसानों के सामने खेतों के बेहतर उपयोग और अतिरिक्त आमदनी का सवाल रहता है। ऐसे में कम अवधि में तैयार होने वाली तोरिया की खेती किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है। उत्तर प्रदेश कृषि विभाग भी किसानों को खरीफ और रबी के बीच उपलब्ध समय का उपयोग करते हुए तोरिया की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
तोरिया सरसों वर्ग की प्रमुख तिलहनी फसलों में शामिल है। इसकी खासियत यह है कि इसे अपेक्षाकृत कम समय, कम लागत और सीमित सिंचाई में उगाया जा सकता है। सामान्य परिस्थितियों में इसकी फसल करीब 90 दिनों में तैयार हो जाती है। इस कारण किसान खरीफ की फसल के बाद तोरिया लेकर उसके बाद गेहूं, आलू, सरसों या अन्य रबी फसलों की बुवाई कर सकते हैं।
तोरिया की खेती की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम अवधि है। सितंबर के शुरुआती दिनों में इसकी बुवाई करने पर नवंबर के आसपास फसल कटाई के लिए तैयार हो सकती है। इससे किसानों को खेत को लंबे समय तक एक ही फसल में बांधकर रखने की जरूरत नहीं पड़ती। समय पर तोरिया की कटाई के बाद उसी खेत में रबी की मुख्य फसल बोई जा सकती है।
खरीफ में धान, मक्का या अन्य फसलों की कटाई के बाद जिन खेतों में रबी की बुवाई तक कुछ समय खाली रहता है, वहां तोरिया की खेती की जा सकती है। इस तरह किसान उसी कृषि भूमि से एक अतिरिक्त फसल प्राप्त कर सकते हैं।कम लागत में अतिरिक्त आमदनी का अवसर
तोरिया की खेती में अपेक्षाकृत कम लागत आती है। बीज, उर्वरक और सिंचाई पर होने वाला खर्च कई अन्य फसलों की तुलना में सीमित रह सकता है। कम अवधि में तैयार होने के कारण किसान कम समय में उपज प्राप्त कर उसे बाजार में बेच सकते हैं। इस दृष्टि से तोरिया को किसानों के लिए अतिरिक्त आय देने वाली फसल के रूप में देखा जाता है।
हालांकि वास्तविक लाभ क्षेत्र, मौसम, बीज की गुणवत्ता, उत्पादन, बाजार भाव और खेती की लागत पर निर्भर करता है। इसलिए किसान स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह और अपने क्षेत्र की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर इसकी खेती का निर्णय ले सकते हैं।
तोरिया की खेती उन क्षेत्रों में भी की जा सकती है जहां सिंचाई के पानी की उपलब्धता सीमित है। इसे अत्यधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि पानी की कमी वाले क्षेत्रों में किसान इसे खरीफ और रबी के बीच की अवधि में एक विकल्प के रूप में अपना सकते हैं।
तोरिया एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है। इसके दानों में लगभग 41 से 43 प्रतिशत तक तेल पाया जाता है। इससे खाद्य तेल प्राप्त किया जाता है। इसके अलावा तेल निकालने के बाद बचने वाली खली का उपयोग पशु आहार के रूप में भी किया जाता है।इस प्रकार तोरिया की खेती किसान के लिए केवल एक अतिरिक्त फसल नहीं है, बल्कि कम अवधि में खेत का बेहतर उपयोग, सीमित संसाधनों में उत्पादन और अतिरिक्त आय का अवसर भी उपलब्ध कराती है। खरीफ की कटाई और रबी की बुवाई के बीच का समय यदि सही ढंग से उपयोग किया जाए तो कृषि भूमि से मिलने वाली वार्षिक आमदनी को बढ़ाने में यह फसल सहायक हो सकती है।