एग्रीवेट: Maharashtra sugar production: महाराष्ट्र में इस साल कम बारिश का असर गन्ने की फसल पर दिखाई दे रहा है. राज्य में 2026-27 के गन्ना पेराई सीजन में चीनी उत्पादन करीब 20 फीसदी घटकर 80 लाख टन के आसपास रह सकता है. वेस्ट इंडिया शुगर मिल्स एसोसिएशन (WISMA) के चेयरमैन बीबी थोंबरे ने यह अनुमान जताया है. पिछले सीजन 2025-26 में महाराष्ट्र में करीब 99 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था.
न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, बीबी थोंबरे का कहना है कि महाराष्ट्र में गन्ने की खेती का कुल क्षेत्रफल अच्छा है, लेकिन इस साल प्रति एकड़ गन्ने की उपज 30 से 40 फीसदी तक कम हो रही है. कम बारिश के कारण कई इलाकों में गन्ना सूखने लगा है. उन्होंने कहा कि पेराई में जितनी ज्यादा देरी होगी, खेतों में खड़ी फसल को उतना ही नुकसान हो सकता है. ऐसे में गन्ने की जल्द पेराई शुरू करना जरूरी है, ताकि किसानों को समय पर कुछ आमदनी मिल सके.
कम बारिश का सबसे ज्यादा असर मराठवाड़ा, विदर्भ, सोलापुर और अहिल्यानगर जैसे इलाकों में देखने को मिल रहा है. इन क्षेत्रों में करीब 45 दिनों से पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण गन्ने की फसल सूखने लगी है. WISMA के मुताबिक, अगर समय पर गन्ने की पेराई नहीं हुई तो खेत में खड़ी फसल पूरी तरह सूख सकती है. इससे किसानों के साथ-साथ चीनी मिलों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
महाराष्ट्र सरकार ने इस साल चीनी मिलों का पेराई सीजन 15 अक्टूबर से शुरू करने का फैसला लिया है. थोंबरे ने सरकार के इस फैसले का समर्थन किया है. उनका कहना है कि जल्दी पेराई शुरू होने से किसानों को फायदा मिलेगा और मिलों को भी समय पर गन्ना मिल सकेगा. वहीं, जनवरी और फरवरी में पानी की समस्या बढ़ने की आशंका भी जताई गई है. सूखे जैसे हालात के बीच जलाशयों में पानी पीने के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे मिलों के सामने पानी की चुनौती बढ़ सकती है.
थोंबरे ने बताया कि फिलहाल चीनी की कीमतें बेहतर स्थिति में हैं और दिवाली तक इनके स्थिर रहने की उम्मीद है. गन्ने से चीनी निकलने की दर यानी शुगर रिकवरी कम होने से उत्पादन पर असर पड़ेगा, लेकिन मौजूदा चीनी कीमतों से इस नुकसान की कुछ भरपाई हो सकती है. उन्होंने चीनी को कोटा सिस्टम के बजाय सीधे बाजार में बेचने की अनुमति देने के सरकार के फैसले का भी स्वागत किया. इसके अलावा, निजी चीनी मिलों की करीब 492 करोड़ रुपये की ब्याज सब्सिडी भी लंबित है. थोंबरे के अनुसार, 2015 की सॉफ्ट लोन योजना के तहत महाराष्ट्र में इसका लाभ केवल सहकारी मिलों को दिया गया था. निजी मिलें अब भी चार साल की जमा ब्याज सब्सिडी का इंतजार कर रही हैं. संगठन ने इस भुगतान के लिए राज्य सरकार और शुगर कमिश्नरेट के पास आवेदन दिया है.