एग्रीवेट: Weedicide Registration: खेतों में खरपतवार यानी फसलों के साथ उगने वाली बेकार घास और जंगली पौधे किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन जाते हैं. ये फसल के पोषक तत्व, पानी और जगह का इस्तेमाल करते हैं, जिससे पैदावार पर असर पड़ सकता है. इन पर काबू पाने के लिए किसान खरपतवारनाशक दवाओं का इस्तेमाल करते हैं. अब ऐसी ही एक दवा के निर्माण और आयात से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड को हेलोसल्फ्यूरॉन मिथाइल नाम की खरपतवारनाशक दवा बनाने और आयात करने के लिए दिए गए रजिस्ट्रेशन को रद्द करने का दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला खारिज कर दिया है. इससे कंपनी को राहत मिली है. यह दवा गन्ना, मक्का और धान जैसी फसलों में उगने वाले खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल की जाती है.
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दिल्ली की कंपनी क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड को जुलाई 2021 में कीटनाशक अधिनियम, 1968 के तहत हेलोसल्फ्यूरॉन मिथाइल के आयात और निर्माण की मंजूरी मिली थी. इस दवा का इस्तेमाल घास और चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को खत्म करने के लिए किया जाता है. इनमें मोथा और नागरमोथा जैसे खरपतवार भी शामिल हैं, जो गन्ना, मक्का, धान और लौकी जैसी फसलों में उगते हैं.
कंपनी का कहना था कि, रजिस्ट्रेशन मिलने से पहले उसके उत्पाद के नमूने की केंद्रीय कीटनाशक प्रयोगशाला में जांच हुई थी. साथ ही दवा की रासायनिक बनावट, असर, विषाक्तता और पैकेजिंग से जुड़े दस्तावेज भी जांचे गए थे.
क्रिस्टल क्रॉप को रजिस्ट्रेशन मिलने के बाद उसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनी धानुका एग्रीटेक ने इस फैसले पर आपत्ति जताई. कंपनी ने कीटनाशक अधिनियम की धारा 10 और 11 के तहत अपील की, लेकिन अपीलीय प्राधिकरण ने उसकी अपील खारिज कर दी.
इसके बाद धानुका एग्रीटेक ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की. शुरुआत में हाईकोर्ट के एक जज ने अपीलीय प्राधिकरण के फैसले को सही ठहराया. लेकिन बाद में हाईकोर्ट के दो जजों की पीठ ने क्रिस्टल क्रॉप का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया. इसी फैसले को चुनौती देते हुए क्रिस्टल क्रॉप सुप्रीम कोर्ट पहुंची.
15 अक्टूबर को न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाया. कंपनी ने कोर्ट को बताया कि उसके उत्पाद के नमूने की जांच में 98.53 प्रतिशत शुद्धता मिली थी. इसके साथ ही रजिस्ट्रेशन समिति ने दवा बनाने वाली मूल कंपनी और सप्लाई करने वाली कंपनी के बीच संबंधों की भी जांच की थी. कंपनी ने इसके लिए जरूरी समझौते और सभी दस्तावेज भी जमा किए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस मामले में अपने अधिकार से आगे बढ़कर फैसला दिया. उसने खुद ही अपीलीय प्राधिकरण की तरह काम किया, जबकि उत्पाद का रजिस्ट्रेशन विशेषज्ञों की जांच और तकनीकी जानकारी के आधार पर किया गया था. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को विशेषज्ञों के फैसले में तभी दखल देना चाहिए, जब उसमें मनमानी या कानून का उल्लंघन हुआ हो.
पीठ ने यह भी साफ किया कि, कीटनाशक अधिनियम की धारा 10 किसी दूसरी कंपनी को दिए गए रजिस्ट्रेशन को चुनौती देने का अधिकार नहीं देती. यह धारा रजिस्ट्रेशन देने से इनकार करने या पहले से मिले रजिस्ट्रेशन को रद्द करने जैसे फैसलों के खिलाफ अपील से जुड़ी है.