लासलगांव मंडी में खरीफ प्याज की आवक शुरू, 2500 रुपये क्विंटल भाव.. क्या रिटेल में सस्ता होगा रेट – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: महाराष्ट्र की लासलगांव एपीएमसी मंडी में खरीफ प्याज की नई फसल की आवक शुरू हो गई है. हालांकि, अभी रोजाना केवल 30 से 40 क्विंटल प्याज ही मंडी में पहुंच रहा है. कारोबारियों और मंडी अधिकारियों का अनुमान है कि नवंबर के पहले या दूसरे सप्ताह से आवक बढ़ने लगेगी. प्रमुख प्याज उत्पादक क्षेत्रों में कटाई तेज होने के साथ मंडी में प्याज की मात्रा बढ़ सकती है. फिलहाल, नए खरीफ प्याज का औसत थोक भाव करीब 2,500 रुपये प्रति क्विंटल है. वहीं, भंडारण किया हुआ पुराना गर्मी का प्याज करीब 4,100 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है. इस तरह नए प्याज की कीमत पुराने प्याज के मुकाबले काफी कम है.

कारोबारियों के मुताबिक, नए और पुराने प्याज की कीमतों में अंतर की मुख्य वजह उनकी भंडारण क्षमता है. खरीफ प्याज को केवल 25 से 30 दिनों तक ही सुरक्षित रखा जा सकता है. इसके बाद प्याज खराब होने लगता है. इसलिए किसानों को कटाई के तुरंत बाद इसे बेचना पड़ता है. वहीं, गर्मी के मौसम में पैदा होने वाले प्याज को छह महीने से ज्यादा समय तक रखा जा सकता है. इससे किसान बाजार में अच्छे भाव मिलने पर अपनी उपज बेच सकते हैं.

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर के पहले पखवाड़े में महाराष्ट्र के धुले और मालेगांव जैसे प्रमुख प्याज उत्पादक क्षेत्रों से भी नई फसल की आवक शुरू होने की उम्मीद है. इससे मंडियों में प्याज की उपलब्धता बढ़ सकती है. एक अधिकारी के मुताबिक, इस साल खरीफ प्याज की फसल मंडियों में सामान्य समय से करीब एक महीने देर से पहुंची है. आमतौर पर जुलाई से सितंबर के मध्य तक प्याज की बुवाई होती है, लेकिन इस बार बारिश देर से शुरू होने के कारण बुवाई में करीब एक महीने की देरी हुई. इसका असर कटाई और मंडियों में नई फसल की आवक पर भी पड़ा है.

आमतौर पर खरीफ प्याज की नई फसल अक्टूबर के दूसरे सप्ताह से मंडियों में पहुंचने लगती है. अक्टूबर के आखिरी सप्ताह तक इसकी आवक में तेजी आ जाती है. लेकिन इस साल बारिश में देरी के कारण यह प्रक्रिया पीछे खिसक गई है. मॉनसून में देरी और असमान बारिश के कारण प्याज की खेती का रकबा भी घटा है. महाराष्ट्र के नासिक जिले में इस साल खरीफ प्याज की खेती करीब 21,242 हेक्टेयर में होने का अनुमान है. यह जिले के सामान्य औसत 32,450 हेक्टेयर के मुकाबले लगभग 35 फीसदी कम है.

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