एग्रीवेट: Cow Calf Care: गाय-भैंस पालन से अच्छी कमाई करने के लिए केवल दूध देने वाले पशुओं की देखभाल करना काफी नहीं है, बल्कि उनके बछड़ों का सही पालन-पोषण भी जरूरी है. जन्म के बाद की गई छोटी-छोटी गलतियां बछड़े और बछड़ी की सेहत और विकास पर बुरा असर डाल सकती हैं. इसका असर आगे चलकर पशु की दूध देने की क्षमता पर भी पड़ सकता है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (कृषि विज्ञान केंद्र, नोएडा) के अनुसार, गर्भावस्था के अंतिम महीनों से लेकर बछड़े के जन्म के बाद तक खानपान, साफ-सफाई और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए. आइए जानते हैं पशुपालकों को किन गलतियों से बचना चाहिए.
गाय-भैंस के बच्चे की देखभाल जन्म से पहले ही शुरू हो जाती है. गर्भावस्था के अंतिम तीन महीनों में गर्भ में पल रहे बछड़े का विकास तेजी से होता है. ऐसे में गर्भवती पशु को पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स वाला संतुलित आहार देना जरूरी है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, गर्भवती पशु को पर्याप्त पोषण नहीं मिलने से बच्चे का जन्म के समय वजन कम हो सकता है. इसलिए पशुपालकों को हरे चारे, सूखे चारे और संतुलित पशु आहार की उचित व्यवस्था करनी चाहिए.
बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसकी नाक और मुंह से श्लेष्मा साफ करना जरूरी है, ताकि उसे सांस लेने में परेशानी न हो. इसके अलावा नवजात को मां का पहला दूध यानी खीस जल्द से जल्द पिलाना चाहिए. खीस में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले तत्व होते हैं. जन्म के पहले एक से दो घंटे के भीतर खीस पिलाना शुरू करना बेहतर होता है. शुरुआती 24 घंटों में बछड़े को उसके वजन के लगभग 10 प्रतिशत के बराबर खीस कई बार में दी जा सकती है. उदाहरण के लिए, 20 किलो वजन वाले बछड़े को करीब 2 लीटर खीस की जरूरत हो सकती है.
नवजात पशुओं में पेट के कीड़े उनके विकास को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए पशु चिकित्सक की सलाह से समय पर कृमिनाशक दवा देना जरूरी है. कई परिस्थितियों में 14 से 15 दिन की उम्र से डिवार्मिंग शुरू करने की सलाह दी जाती है. हालांकि, दवा और अंतराल बछड़े की उम्र, वजन और संक्रमण के जोखिम के अनुसार तय होने चाहिए. वहीं, दूसरे सप्ताह के आसपास से बछड़े को थोड़ी मात्रा में अच्छी गुणवत्ता वाला काफ स्टार्टर देना शुरू किया जा सकता है. इसमें करीब 18 से 22 प्रतिशत प्रोटीन वाला आहार उपयोगी हो सकता है. इससे पाचन तंत्र के विकास और वजन बढ़ाने में मदद मिलती है.
गाय-भैंस के बछड़ों को गंदे और गीले स्थान पर रखने से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए पशुपालकों को उनके रहने के लिए साफ, सूखी और हवादार जगह की व्यवस्था करनी चाहिए. कमजोर और बीमार बछड़ों की अलग निगरानी करना भी जरूरी है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, बछड़ों को बीमारियों से बचाने के लिए समय पर टीकाकरण भी महत्वपूर्ण है. टीकाकरण का कार्यक्रम स्थानीय पशु चिकित्सा विभाग की सलाह के अनुसार तय करना चाहिए. पशुपालकों को ध्यान रखना चाहिए कि स्वस्थ बछड़ी के सही विकास से भविष्य में बेहतर दूध उत्पादन की संभावना बढ़ सकती है. इसलिए शुरुआत से ही पोषण, सफाई, खीस, कृमिनाशक उपचार और टीकाकरण पर ध्यान देना जरूरी है.