‘धान के पिता’ कहलाने वाले चेरुवायल रमन का निधन, 17 साल की उम्र से बचा रहे थे धान की पुरानी किस्में – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: Cheruvayal Raman: केरल के वायनाड में धान की देसी किस्मों को बचाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा देने वाले चेरुवायल रमन का 74 साल की उम्र में निधन हो गया. उन्हें स्थानीय लोग प्यार से ‘नेल्लाचन’ यानी ‘धान के पिता’ (Father of Paddy) कहते थे. उम्र से जुड़ी बीमारियों के कारण 14 अक्टूबर 2026 को कोझिकोड मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हुआ. रमन ने महज 17 साल की उम्र से पारंपरिक धान के बीजों को सहेजने का काम शुरू किया था. साल 2023 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित भी किया गया था.

चेरुवायल रमन कुरिचिया आदिवासी समुदाय से आते थे. इस समुदाय के लोगों को धान की पारंपरिक खेती का अच्छा अनुभव रहा है. रमन ने महज 17 साल की उम्र में अपने मामा के निधन के बाद धान के पुराने बीजों को बचाने की जिम्मेदारी संभाली थी. उस समय शायद उन्हें भी नहीं पता था कि आगे चलकर यही काम उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद बन जाएगा.

उन्होंने अपने पुश्तैनी घर और खेतों को धान की पुरानी किस्मों को बचाने का ठिकाना बना लिया. उनके पास वायनाड की धान की 50 पुरानी किस्मों के अलावा केरल के दूसरे इलाकों से जुटाई गई 14 किस्मों के बीज भी थे. वह हर किस्म को अलग खेत में उगाते थे. फसल तैयार होने पर उसके बीज निकालकर संभाल लेते थे, ताकि अगले सीजन में फिर से बुवाई की जा सके. रमन की खास बात यह थी कि वह इन बीजों को सिर्फ अपने पास नहीं रखते थे. वह दूसरे किसानों, खासकर आदिवासी परिवारों को मुफ्त में भी बीज बांटते थे. उनका मकसद था कि, धान की ये पुरानी किस्में ज्यादा से ज्यादा किसानों के खेतों तक पहुंचें और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बची रहें.

रमन के पास चेननेलु, थोंडी, चेम्बकम, वेलियन, गंधकसाला और कयामा जैसी कई पारंपरिक किस्में थीं. इनमें से कुछ अपने खास स्वाद और खुशबू के लिए जानी जाती हैं, तो कुछ का इस्तेमाल खास तरह के पकवान बनाने में होता है. इन बीजों की अहमियत सिर्फ खाने के स्वाद तक सीमित नहीं थी. अलग-अलग किस्में मिट्टी, पानी और मौसम के हिसाब से अलग तरह से बढ़ती हैं. रमन अपने अनुभव से समझते थे कि, किस किस्म को किस तरह की जमीन और परिस्थितियों में उगाना बेहतर रहेगा. कुछ पारंपरिक किस्मों में ज्यादा पानी या कम पानी जैसी परिस्थितियों को सहने के खास गुण भी हो सकते हैं, हालांकि यह उनकी किस्म और खेती के हालात पर निर्भर करता है.

रमन के मुताबिक, वायनाड में कभी धान की करीब 160 देसी किस्में उगाई जाती थीं. समय के साथ धान के खेतों की जगह कॉफी, काली मिर्च, अदरक और दूसरी व्यावसायिक फसलों ने ले ली. धान की खेती में बढ़ते खर्च और कम आमदनी के कारण कई किसानों के लिए इसे जारी रखना मुश्किल हो गया. इसका असर सिर्फ खेती की जमीन पर नहीं पड़ा. जब किसी किस्म की बुवाई बंद हो जाती है, तो उसके बीज के साथ उससे जुड़ा अनुभव भी धीरे-धीरे खत्म होने लगता है.

बीजों को संभालकर रखने, फसल उगाने और उन्हें खाने में इस्तेमाल करने के पारंपरिक तरीके भी अगली पीढ़ी तक पहुंचना बंद हो सकते हैं. रमन ने इन मुश्किलों के बावजूद पारंपरिक धान उगाना जारी रखा. वह मिट्टी की सेहत को भी खेती का जरूरी हिस्सा मानते थे. उनके मुताबिक, उन्होंने 1978 में रासायनिक खाद का इस्तेमाल छोड़ दिया था. उनका मानना था कि खेती से जमीन की ताकत कम नहीं होनी चाहिए.

साल 2023 में रमन के काम को राष्ट्रीय पहचान मिली, उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. उन्हें जीनोम सेवर पुरस्कार और केरल का ग्रीन अवॉर्ड भी मिला. कृषि से जुड़े संस्थानों और विश्वविद्यालयों ने भी उनके अनुभव को अहमियत दी. इसके बावजूद बीजों को बचाए रखने का खर्च उनके लिए चुनौती बना रहा. उनके अनुसार, बीजों के संग्रह और देखभाल पर हर साल करीब 70,000 रुपये खर्च होते थे. उन्हें यह चिंता भी सताती थी कि उनके बाद इन बीजों और पुश्तैनी खेतों की देखभाल कौन करेगा.

चेरुवायल रमन का निधन सिर्फ एक किसान का जाना नहीं, बल्कि खेती की पारंपरिक समझ को सहेजने वाले एक महत्वपूर्ण व्यक्ति का जाना है. उनके काम को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है कि, इन बीजों को खेतों में उगाया जाता रहे, किसानों तक पहुंचाया जाए और उनकी खासियतों को दर्ज किया जाए. पारंपरिक किस्मों को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ किसी एक किसान पर नहीं छोड़ी जा सकती. इसके लिए आर्थिक मदद, जमीन, बीजों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था और कृषि संस्थानों का सहयोग जरूरी है.

रमन की असली विरासत पुरस्कारों में नहीं, बल्कि उन बीजों में है जिन्हें उन्होंने दशकों तक जिंदा रखा. अब उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि ये बीज खेतों में उगते रहें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचें.

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