एग्रीवेट: Desi Cotton: कपास की खेती में ज्यादा पैदावार मिलने के बावजूद किसान देसी कपास से दूरी बना रहे हैं. राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुए कृषि अनुसंधान में सामने आया है कि देसी कपास की पैदावार अमेरिकन कपास के मुकाबले करीब 26 प्रतिशत अधिक पाई गई है. इसके बावजूद बुवाई के समय और फसल की चुनाई में आने वाली परेशानियों के कारण किसान इसे उगाने से कतरा रहे हैं. स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अनुसंधान केंद्र में वर्ष 1967 से कपास की अलग-अलग किस्मों पर शोध किया जा रहा है. अब कृषि विशेषज्ञ देसी कपास की खूबियों को किसानों तक पहुंचाने और इसकी खेती को बढ़ावा देने पर जोर दे रहे हैं.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, श्रीगंगानगर स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र में किए गए शोध के अनुसार, देसी कपास की उत्पादन क्षमता अमेरिकन कपास की तुलना में करीब 26 प्रतिशत अधिक पाई गई है. अनुसंधान अधिकारी डॉ. एनके शर्मा ने बताया कि केंद्र में लंबे समय से कपास की विभिन्न किस्मों का परीक्षण किया जा रहा है. इसका उद्देश्य ऐसी किस्मों की पहचान करना है, जो बेहतर पैदावार देने के साथ बीमारियों का सामना करने में भी सक्षम हों. देसी कपास की बेहतर उत्पादन क्षमता सामने आने के बाद विशेषज्ञ इसकी खेती को प्रोत्साहित करने पर जोर दे रहे हैं. हालांकि, पैदावार के अलावा बुवाई का सही समय, मजदूरों की उपलब्धता और फसल की कटाई-चुनाई जैसे पहलू भी किसानों के फैसले को प्रभावित करते हैं.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अनुसंधान केंद्र में वर्ष 1967 से कपास की अलग-अलग किस्मों पर अनुसंधान किया जा रहा है. यहां भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की ऑल इंडिया कोऑर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत देसी और अमेरिकन कपास की कुल 14 किस्मों पर काम हो रहा है. इनमें देसी कपास की चार और अमेरिकन कपास की 10 किस्में शामिल हैं. इसके अलावा निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित संकर किस्मों का भी परीक्षण किया जाता है. इन किस्मों की पैदावार, बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता और अलग-अलग परिस्थितियों में प्रदर्शन का आकलन किया जाता है. बेहतर प्रदर्शन करने वाली संकर किस्मों की सिफारिश राजस्थान सरकार को भेजी जाती है.
देसी कपास की खेती कम होने के पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं. डॉ. एनके शर्मा के मुताबिक, इसकी बुवाई का समय नहरबंदी की अवधि के आसपास पड़ता है. इससे किसानों के सामने सिंचाई और खेती के काम को समय पर पूरा करने की चुनौती आ सकती है. इसके अलावा देसी कपास की फसल में दो से तीन बार चुनाई करनी पड़ती है. यानी फसल से कपास निकालने के लिए खेत में कई बार मजदूर लगाने पड़ सकते हैं. वर्तमान समय में मजदूरों की सीमित उपलब्धता भी किसानों के लिए परेशानी बन रही है. ऐसे में किसान खेती की ऐसी किस्मों को प्राथमिकता दे सकते हैं, जिनकी बुवाई और कटाई-चुनाई उनके लिए आसान हो. यही वजह है कि बेहतर उत्पादन क्षमता के बावजूद देसी कपास का प्रचलन बढ़ाना चुनौती बना हुआ है.
श्रीगंगानगर के कृषि अनुसंधान केंद्र में कपास की पुरानी और नई किस्मों पर लगातार काम हो रहा है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बीकानेरी नरमा, गंगानगर अगेता और आरएसटी-9 जैसी किस्मों को किसान लंबे समय से जानते हैं. वहीं, देसी कपास की आरजी-8 किस्म भी प्रचलित है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि देसी कपास की खूबियों, उत्पादन क्षमता और खेती के सही तरीके की जानकारी किसानों तक पहुंचाना जरूरी है. इसके लिए किसानों को जागरूक करने के साथ ऐसी किस्मों की पहचान भी जरूरी है, जो स्थानीय परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन कर सकें. वैज्ञानिकों का प्रयास है कि किसानों को बेहतर पैदावार देने वाली और बीमारियों से होने वाले नुकसान को कम करने में मददगार किस्में उपलब्ध कराई जाएं. इससे कपास की खेती को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में मदद मिल सकती है.