एग्रीवेट: 08 अक्टूबर 2026, लातूर: महाराष्ट्र में सूखे का संकट गहराया, 16 अक्टूबर से राज्यव्यापी जल कटौती – महाराष्ट्र ने अपनी 358 तहसीलों में से करीब तीन-चौथाई को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया है। वर्ष 2015 के बाद इस वर्ष के सबसे कमजोर मानसून के बीच राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर से घरेलू, औद्योगिक और सिंचाई जल आपूर्ति में अनिवार्य रूप से 10 प्रतिशत कटौती का आदेश दिया है। खरीफ फसलों के नष्ट होने से वर्षा आधारित मराठवाड़ा क्षेत्र में संकट और गहरा गया है।
राज्य अधिकारियों ने सितंबर के अंत में पुष्टि की थी कि 358 में से 265 तहसीलों को अब सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। इस सप्ताह सामने आए आंकड़ों के अनुसार, जून से सितंबर तक के मानसून में राज्य में दीर्घकालिक औसत की तुलना में 12.6 प्रतिशत कम बारिश हुई, जो 2015 के बाद राज्य में दर्ज सबसे बड़ी बारिश की कमी है। जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन ने कहा कि उनके विभाग ने 31 अगस्त, 2027 तक के लिए जलाशयवार और उपयोगवार जल प्रबंधन योजना तैयार की है। इसमें सिंचाई और औद्योगिक उपयोग की तुलना में पेयजल को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि यदि सर्दियों के दौरान जलाशयों का जलस्तर लगातार गिरता रहा तो पानी की कटौती और बढ़ाई जा सकती है।
नुकसान मुख्य रूप से लातूर, बीड और धाराशिव जिलों में केंद्रित है। इन तीन जिलों का कुल क्षेत्रफल करीब 25,400 वर्ग किलोमीटर है, जो महाराष्ट्र के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 8.2 प्रतिशत है। यहां की गहरी काली मिट्टी सामान्यतः कपास, सोयाबीन, अरहर और ज्वार जैसी फसलों के लिए अनुकूल मानी जाती है।
इस वर्ष मानसून के आगमन में सात से 10 दिन की देरी हुई और जून में सामान्य से केवल 65 प्रतिशत बारिश हुई। क्षेत्र की प्रमुख वर्षा आधारित फसल सोयाबीन है, जिसे किसान इसलिए भी बड़े पैमाने पर उगाते हैं क्योंकि इसे तुलनात्मक रूप से कम पानी और श्रम की आवश्यकता होती है। लेकिन इस वर्ष किसानों के अनुसार इन तीनों जिलों के बड़े हिस्से में सोयाबीन की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है।
लातूर के जिलाधिकारी डॉ. भारत बस्तेवाड़ ने भी स्थिति को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि 2027 में भी परिस्थितियां कठिन रह सकती हैं और प्रशासन को अभी पानी खुले तौर पर जारी करने के बजाय उसे भविष्य के लिए सुरक्षित रखना होगा। क्षेत्र के किसानों के अनुसार, उन्हें कम कीमतों पर मवेशियों की मजबूरी में बिक्री करनी पड़ रही है। कुछ किसानों का कहना है कि यदि रबी का मौसम भी खराब रहता है तो जनवरी या फरवरी तक परिवार के कुछ सदस्यों को रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करना पड़ सकता है।
किसानों की परेशानी इस वजह से भी बढ़ी है कि पिछले वर्ष राज्य के कुछ हिस्सों में बाढ़ से हुए नुकसान के बाद घोषित मुआवजा अभी तक प्रभावित परिवारों तक पूरी तरह नहीं पहुंचा है। इसी बीच एक नया कृषि संकट सामने आ गया है।
राज्य सरकार ने इस सप्ताह के जल कटौती आदेश से पहले ही सितंबर के अंत में करीब 6,700 से 7,000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि थी। इसमें ग्रामीण रोजगार के लिए धन उपलब्ध कराने के साथ कृषि ऋणों के पुनर्गठन का प्रावधान शामिल है। हालांकि, किसानों और विपक्षी नेताओं ने इस पैकेज को अंतरिम राहत बताते हुए कहा है कि यह जमीनी स्तर पर हुए फसल नुकसान के पैमाने के अनुरूप नहीं है।
महाराष्ट्र भारत के कुल आर्थिक उत्पादन में करीब 14 प्रतिशत का योगदान देता है। इस सप्ताह की रिपोर्टों में पानी से जुड़े जोखिम को रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा समूह और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे प्रमुख औद्योगिक नियोक्ताओं के साथ-साथ मुंबई के वित्तीय क्षेत्र के लिए भी रेखांकित किया गया है, जो इसी दबाव वाले जलाशय तंत्र पर निर्भर है। राज्य में खाद्य महंगाई अब लगातार सातवें महीने बढ़ी है। अधिकारियों के अनुसार, इसका सीधा संबंध खरीफ फसल उत्पादन में आई कमी से है।
महाराष्ट्र भारत के सबसे बड़े कृषि-इनपुट उपभोग वाले राज्यों में से एक है। राज्य में बीज, उर्वरक और फसल सुरक्षा उत्पाद बेचने वाली कंपनियों के लिए यह सूखा वर्षा आधारित तहसीलों में आगामी रबी बुवाई के कमजोर रहने का संकेत देता है। साथ ही, जिन खरीफ फसलों पर इनपुट का इस्तेमाल किया गया था और जो बाद में पूरी तरह नष्ट हो गईं, उनके कारण खरीफ इनपुट की दोबारा मांग भी प्रभावित हो सकती है।
मराठवाड़ा के साथ-साथ विदर्भ और उत्तर महाराष्ट्र में काम करने वाले वितरकों को किसानों की आय में गिरावट के कारण वसूली की गति धीमी होने और क्रेडिट अवधि बढ़ने की स्थिति के लिए तैयार रहना पड़ सकता है। दूसरी ओर, बार-बार आने वाले अल नीनो वर्षों से जोखिम कम करने के लिए ड्रिप और माइक्रो-इरिगेशन सब्सिडी तथा सूखा-सहिष्णु बीज किस्मों पर राज्य का जोर फिर बढ़ सकता है। इन जिलों में तिलहन और दलहन की मांग से जुड़े इनपुट आपूर्तिकर्ताओं को इस रबी सीजन में मात्रा पर सबसे तत्काल प्रभाव देखने को मिल सकता है।