एग्रीवेट: 02 नवंबर 2026, सिरसा: सिरसा के किसान सुखजीत सिंह ने बागवानी और प्रोसेसिंग से खड़ा किया करोड़ों का कारोबार – जिले के किसान सुखजीत सिंह ने परंपरागत खेती का रास्ता छोड़कर बागवानी और जैविक प्रोसेसिंग अपनाई, और आज उनका कृषि कारोबार करोड़ों रुपये तक पहुंच गया है। उनके पास कुल 72 एकड़ जमीन है, जिसमें से 25 एकड़ पर किन्नू और 8 एकड़ पर अमरूद की बागवानी होती है।
सुखजीत सिंह ने 2015 में बागवानी की तरफ रुख किया था। उनकी बागवानी आधारित आय करीब 60 लाख रुपये सालाना है, जबकि अपने FPO के तहत आटा, दाल, तेल और घी जैसे उत्पादों की प्रोसेसिंग व बिक्री को मिलाकर उनका कुल कारोबार करीब 3 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। बाकी 5 एकड़ जमीन पर वे जैविक गेहूं और बाजरे की खेती करते हैं, और फसल-चक्र अपनाकर अपनी इनपुट लागत कम रखने की कोशिश करते हैं।
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खेती में रासायनिक खाद की जगह सुखजीत सिंह गोमूत्र और गोबर से जीवामृत व घन-जीवामृत जैसे जैविक तरल खाद खुद तैयार करते हैं। 2018 में उन्होंने “एक्रेफार्म फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी” नाम से अपना एफपीओ पंजीकृत कराया।
इस एफपीओ के जरिए वे “सिरसा नेचुरल” ब्रांड के नाम से आटा, दाल, सरसों का तेल और देसी घी जैसे उत्पाद बाजार में बेचते हैं। उनके किन्नू, आलू, अमरूद और मौसमी सब्जियां दिल्ली, अहमदाबाद, बेंगलुरु और मुंबई की मंडियों में जाती हैं, जबकि दिल्ली, चंडीगढ़ और पंजाब में वे सीधे उपभोक्ताओं को भी बिक्री करते हैं।
सुखजीत सिंह के इस मॉडल ने गांव के 12 युवाओं को सीधा रोजगार दिया है, जबकि इलाके के 600 से ज्यादा किसान अप्रत्यक्ष रूप से उनसे प्रेरित होकर अपनी खेती में बदलाव ला रहे हैं। आलू बीज उत्पादन में अच्छे काम के लिए उन्हें सम्मान भी मिल चुका है।
सुखजीत सिंह कहते हैं, “खेती ने मुझे सब कुछ दिया है — पहचान, कमाई और मन की शांति।” वे आगे कहते हैं, “अगर हम जमीन का सम्मान करें, तो जमीन भी हमें सम्मान लौटाती है।” आने वाले समय में वे अपने फलों का सीधा अंतरराष्ट्रीय निर्यात और उपभोक्ताओं तक फार्म-से-सीधी-सप्लाई मॉडल शुरू करने की योजना बना रहे हैं।
सिरसा जिला पारंपरिक तौर पर कपास और गेहूं-धान के फसल चक्र के लिए जाना जाता है, और यहां के ज्यादातर किसान अब भी इन्हीं फसलों पर निर्भर हैं। ऐसे माहौल में सुखजीत सिंह का किन्नू-अमरूद बागवानी मॉडल इलाके के लिए एक अलग रास्ता दिखाता है, जिसमें कम पानी में भी बेहतर कमाई संभव हो पाती है।
उनका कहना है कि बागवानी के साथ प्रोसेसिंग जोड़ने से किसान को सिर्फ कच्चा माल बेचने के बजाय उसकी कीमत बढ़ाकर बेचने का मौका मिलता है। गेहूं से आटा, सरसों से तेल और दूध से घी बनाकर बेचने पर मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है, जबकि कच्चा अनाज बेचने पर किसान को मंडी के भाव पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
सुखजीत सिंह के खेत में जीवामृत बनाने के लिए गाय के गोबर और गोमूत्र को गुड़ व बेसन के साथ मिलाकर कुछ दिन तक किण्वित (फर्मेंट) किया जाता है। इसके बाद इसे पानी में घोलकर खेत में डाला जाता है, जिससे मिट्टी में फायदेमंद सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है और रासायनिक खाद पर खर्च घटता है।
इलाके के कई युवा किसान अब सुखजीत सिंह के खेतों में आकर यह तरीका सीखने लगे हैं। वे बताते हैं कि शुरुआत में उपज थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन दो-तीन साल में मिट्टी की सेहत सुधरने के साथ पैदावार और गुणवत्ता दोनों में फायदा दिखने लगता है।
हरियाणा के कई और जिलों में भी अब किसान पारंपरिक गेहूं-धान चक्र से हटकर बागवानी और प्रोसेसिंग की तरफ रुख कर रहे हैं। कृषि विभाग के अधिकारी मानते हैं कि सुखजीत सिंह जैसे किसानों के उदाहरण से आसपास के इलाकों में भी फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलता है, जिससे पानी की खपत घटाने और मिट्टी की सेहत सुधारने दोनों में मदद मिलती है।