एग्रीवेट: 05 नवंबर 2026, नई दिल्ली: रबी बुवाई 46 प्रतिशत पीछे: मिट्टी की नमी घटने से किसानों की बढ़ी चिंता – देश में रबी फसलों की बुवाई इस साल पिछले साल की तुलना में करीब 46 प्रतिशत पीछे चल रही है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, 30 अक्टूबर तक देशभर में कुल 37.56 लाख हेक्टेयर में ही रबी फसलों की बुवाई हो पाई है, जबकि पिछले साल इसी तारीख तक यह आंकड़ा 69.02 लाख हेक्टेयर था।
गेहूं की बुवाई पर इसका सबसे ज्यादा असर दिखा है। अभी तक सिर्फ 19,000 हेक्टेयर में गेहूं बोया गया है, जबकि पिछले साल इसी समय तक यह रकबा 3.34 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया था। दलहन फसलों की बुवाई भी 19.56 लाख हेक्टेयर से घटकर 9.45 लाख हेक्टेयर रह गई है, जिसमें चने का रकबा 14.35 लाख से 5.90 लाख हेक्टेयर तक सिमट गया है।
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तिलहन फसलों में भी गिरावट दर्ज हुई है। सरसों-राई समेत तिलहन की बुवाई 38.62 लाख हेक्टेयर से घटकर 20.97 लाख हेक्टेयर रह गई, जिसमें सरसों-राई का हिस्सा 38.07 लाख से 20.50 लाख हेक्टेयर रहा। मोटे अनाज की बुवाई 4.22 लाख से मामूली घटकर 3.78 लाख हेक्टेयर और जाड़े के धान की बुवाई 3.29 लाख से 3.16 लाख हेक्टेयर रही।
मंत्रालय के अनुसार जून से सितंबर के बीच मानसून की बारिश में करीब 13 प्रतिशत की कमी रही, जिसकी वजह से खरीफ की कटाई के बाद खेतों में बची नमी भी घट गई। कई प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों के जलाशयों और नहरों में पानी का स्तर सामान्य से नीचे है। गेहूं की फसल को बुवाई के बाद कई बार सिंचाई की ज़रूरत पड़ती है, इसलिए पानी की कमी का असर इस फसल पर ज्यादा पड़ रहा है।
इन हालात की समीक्षा के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को एक बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें रबी बुवाई की रफ्तार और आगे की तैयारियों पर चर्चा हुई। बैठक में कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।
चौहान ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि खरीफ की कटाई के बाद खेतों में बची नमी का पूरा इस्तेमाल करते हुए रबी बुवाई में तेज़ी लाई जाए। जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा सीमित है, वहां के किसानों को चना, सरसों, मसूर और मोटे अनाज जैसी कम पानी और कम लागत वाली फसलें अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने को कहा गया है। किसानों को जलवायु के अनुकूल और गर्मी सहन करने वाले बीज भी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
मंत्रालय ने यह भरोसा भी दिया कि यूरिया, डीएपी, एमओपी और एनपीके खाद का भंडार पर्याप्त है और प्रमाणित बीजों की भी कोई कमी नहीं है। राज्यों के साथ तालमेल करके जिला स्तर तक खाद-बीज की आपूर्ति श्रृंखला पर नज़र रखी जा रही है, ताकि बुवाई रफ्तार पकड़ने पर किसानों को कहीं दिक्कत न आए।
एक राहत की बात यह है कि मंडियों में फसलों के भाव किसानों के लिए फायदेमंद बने हुए हैं। धान, गेहूं, मक्का, चना, मसूर, अरहर, सोयाबीन और सरसों जैसी प्रमुख फसलों के मंडी भाव अभी न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी ऊपर चल रहे हैं। इससे किसानों को बुवाई में हो रही देरी के बावजूद बाज़ार में अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद बनी हुई है।
कृषि अधिकारियों का मानना है कि नवंबर के पहले पखवाड़े में बुवाई रफ्तार पकड़ सकती है, क्योंकि कई इलाकों में अब सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और नहरी पानी का इस्तेमाल बढ़ने लगा है। हालांकि आने वाले दिनों में अगर बारिश नहीं हुई, तो गेहूं और सरसों के कुल रकबे पर इसका असर पड़ सकता है, जिससे आगे मंडी भाव और सरकारी खरीद की रणनीति दोनों प्रभावित हो सकती हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए मंत्रालय की यह सलाह खासतौर पर अहम है, क्योंकि उनके पास सिंचाई के साधन अक्सर सीमित होते हैं और कम पानी वाली फसलों की ओर रुख करना उनके लिए फायदेमंद हो सकता है।