मिट्टी के दीयों से ब्लैक पॉटरी तक, कारीगरों को मिला बड़ा बाजार.. माटीकला महोत्सव में जमकर हो रही खरीदारी – एग्रीवेट

Team Agrivate
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मिट्टी के दीयों से ब्लैक पॉटरी तक, कारीगरों को मिला बड़ा बाजार.. माटीकला महोत्सव में जमकर हो रही खरीदारी - एग्रीवेट - मिट्टी दीयों ब्लैक

एग्रीवेट: Matikala Mahotsav 2026: दिवाली का त्योहार हो और घर में मिट्टी के दीये न हों, ऐसा कम ही देखने को मिलता है. इस बार अगर आप भी दिवाली की खरीदारी करने जा रहे हैं, तो चीन के बने सामान के बजाय अपने देश के कुम्हारों और मिट्टी के कारीगरों के हाथों से बने दीये, बर्तन और सजावटी सामान खरीद सकते हैं. इससे न सिर्फ आपके घर की रौनक बढ़ेगी, बल्कि उन कारीगरों को भी मदद मिलेगी, जिनकी रोजी-रोटी इसी काम से चलती है.

इसी मकसद से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 11 दिवसीय माटीकला महोत्सव-2026 लगाया गया है. ‘मिट्टी से संस्कृति, संस्कृति से समृद्धि’ की थीम पर आयोजित ये महोत्सव 28 अक्टूबर से 7 नवंबर, 2026 तक चलने वाला है. डालीबाग स्थित खादी भवन परिसर में चल रहे इस महोत्सव में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आए कुम्हार और माटी शिल्पकार अपने बनाए सामान बेच रहे हैं. यहां करीब 50 दुकानों के जरिए मिट्टी से बने अलग-अलग सामान की प्रदर्शनी और बिक्री की जा रही है. खास बात यह है कि, महोत्सव के दूसरे दिन ही सामान की बिक्री 3 लाख रुपये का आंकड़ा पार कर गई.

महोत्सव के दूसरे दिन उत्तर प्रदेश के वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना भी प्रदर्शनी देखने पहुंचे. उन्होंने अलग-अलग जिलों से आए कारीगरों के स्टॉल पर जाकर उनके उत्पाद देखे और उनकी मेहनत की तारीफ की. प्रदर्शनी में भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की मूर्तियां, डिजाइनर दीये, टेराकोटा से बनी सजावटी चीजें और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी के बर्तन आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं. यहां पारंपरिक सामान के साथ नए डिजाइन के उत्पाद भी देखने को मिल रहे हैं. मंत्री ने लोगों से अपील की कि, वे दिवाली पर स्थानीय कारीगरों के बनाए मिट्टी के सामान खरीदें, ताकि उनकी कमाई बढ़ सके.

महोत्सव का एक बड़ा मकसद स्थानीय मिट्टी के उत्पादों को बाजार में पहचान दिलाना भी है. खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के सीईओ शिशिर के मुताबिक, आज स्थानीय कारीगरों को चीन से आने वाले सस्ते सामान से मुकाबला करना पड़ रहा है. ऐसे में सिर्फ सामान बनाना काफी नहीं है, बल्कि उसकी डिजाइन, क्वालिटी और कीमत पर भी ध्यान देना जरूरी है.

माटी कला महोत्सव-2026 में कानपुर के सुशांत अपने ब्रांड ‘सर्वोसार्थ कलेक्शन’ के जरिए पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों को आधुनिक रूप दे रहे हैं। सरकारी सहयोग से उनके उत्पादों को देशभर में नई पहचान मिल रही है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इनकी मांग बढ़ रही है।

माटीकला बोर्ड के सीईओ शिशिर ने बताया कि, सरकार का मकसद सिर्फ महोत्सव लगाकर सामान बिकवाना नहीं है, बल्कि कुम्हारों को अपना काम आगे बढ़ाने में भी मदद करना है. इसके लिए उन्हें मिट्टी और दूसरे कच्चे माल की व्यवस्था, काम करने के औजार, नई तकनीक की ट्रेनिंग और बैंक से लोन दिलाने में मदद दी जा रही है. साथ ही, उनके बनाए सामान को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ने की कोशिश भी हो रही है.

उन्होंने बताया कि प्रदेश में अब तक 48 हजार से ज्यादा शिल्पकार परिवारों की पहचान की गई है. करीब 40 हजार कारीगरों को मिट्टी के लिए जमीन या पट्टे की सुविधा दी गई है. वहीं, 18,400 से ज्यादा बिजली से चलने वाले चाक बांटे जा चुके हैं. चालू वित्त वर्ष में करीब 4,900 शिल्पकारों को ट्रेनिंग देने का लक्ष्य है.

माटी कला महोत्सव-2026 के माध्यम से उत्तर प्रदेश की पारंपरिक माटी कला को नया मंच मिल रहा है। साथ ही कारीगरों को अपने हुनर को प्रदर्शित करने, उत्पादों को नई पहचान दिलाने और उद्यम का विस्तार करने के अवसर मिल रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर माटीकला महोत्सव आयोजित किए जा रहे हैं. लखनऊ के डालीबाग स्थित खादी भवन परिसर में 28 अक्टूबर से 7 नवंबर तक 11 दिवसीय महोत्सव चल रहा है. वहीं, आजमगढ़ के डॉ. आंबेडकर पार्क में 1 से 7 नवंबर तक सात दिवसीय मेला लगेगा. यहां 25 स्टॉल लगाए जाएंगे, जिनमें मिट्टी के दीयों के साथ निजामाबाद की मशहूर ब्लैक पॉटरी और चुनार की टेराकोटा कला भी देखने को मिलेगी.

इसके अलावा, बरेली के पीएम श्री राजकीय इंटर कॉलेज परिसर में भी 1 से 7 नवंबर तक क्षेत्रीय माटीकला मेला आयोजित किया जाएगा. नोएडा में भी जिला स्तर पर महोत्सव कराने की तैयारी शुरू हो गई है. हालांकि वहां आयोजन की तारीख और जगह अभी तय नहीं हुई है.

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