बासमती चावल पर यूरोपीय संघ में विवाद, कई देश PGI टैग देने का कर रहे विरोध.. जानें वजह – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: यूरोपीय संघ (EU) में भारतीय बासमती चावल के ‘संरक्षित भौगोलिक संकेतक’ (PGI) टैग को रोकने और इसे एक साधारण (जेनेरिक) किस्म साबित करने की कोशिशें तेज हो गई हैं. यूरोपीय देश भारत को बासमती का विशेष अधिकार देने का विरोध कर रहे हैं, ताकि भारतीय चावल को मिलने वाली खास वैश्विक पहचान और प्रीमियम कीमतों को प्रभावित किया जा सके. यूरोप के कुछ विशेषज्ञों ने दावा किया है कि वहां ‘सुगंधित चावल’ के नाम पर बेचे जाने वाले चावल की मात्रा भारत के मूल उत्पादन क्षेत्र की तुलना में दस गुना अधिक है. उनका आरोप है कि बाजार में बिकने वाला 90 प्रतिशत बासमती चावल असली नहीं है. हालांकि, व्यापारिक सूत्रों के अनुसार, इन यूरोपीय विशेषज्ञों के पास अपने इस दावे को साबित करने के लिए कोई प्रयोगशाला जांच (Lab Test) या पुख्ता वैज्ञानिक सबूत मौजूद नहीं हैं.

गौरतलब है कि अगर किसी देश के उत्पाद को PGI दर्जा मिलता है, तो उसे उस वस्तु को अपने नाम से बेचने का विशेष अधिकार मिल जाता है. यह टैग यह साबित करता है कि उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी अनोखी सुगंध एक खास भौगोलिक क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी की देन है. PGI टैग मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार  में भारतीय बासमती को बेहतर और प्रीमियम दाम मिलते हैं, जिसे रोकने के लिए अब यूरोप में यह नया पैच फंसाया जा रहा है.

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मन मीडिया संस्थान ‘DW’ पर प्रसारित एक वीडियो रिपोर्ट में फ्रांस के कृषि अनुसंधान संस्थान (CIRAD) की विशेषज्ञ डेल्फिन मैरी-विवियन ने दावा किया है कि भारत के मूल बासमती क्षेत्रों में जितना उत्पादन हो रहा है, वह कुल बिक्री के आंकड़ों से मेल नहीं खाता. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यूरोपीय संघ में बासमती को PGI दर्जा देने में इसी तरह देरी होती रही, तो यह एक साधारण (जेनेरिक) किस्म बनकर रह जाएगा. हालांकि, भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोपीय संघ की यह शर्त भारत की संप्रभुता और अधिकारों के साथ समझौता करने जैसी है. पाकिस्तान ने अपने आवेदन में भारत के कुछ क्षेत्रों को भी अपने बासमती उत्पादक क्षेत्र के रूप में दर्शाया है, जिसके चलते संयुक्त आवेदन स्वीकार करना भारत के भौगोलिक और कानूनी अधिकारों को नुकसान पहुंचा सकता है.

भारतीय बासमती चावल को विशेष भौगोलिक दर्जा (PGI) देने के मामले में यूरोपीय संघ (EU) की मंशा पर सवाल उठने लगे हैं. भारत ने जुलाई 2018 में यूरोपीय संघ के पास PGI टैग के लिए आवेदन किया था, लेकिन EU ने इस पर सालों तक कोई फैसला नहीं लिया. इस ढिलाई के बीच अप्रैल 2024 में पाकिस्तान ने भी अपने बासमती के लिए आवेदन कर दिया, जिसके बाद EU के निष्पक्ष होने पर ट्रेड एक्सपर्ट्स सवाल उठा रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत ने 2018 में आवेदन किया था, तब पाकिस्तान के पास अपना वैध घरेलू GI रजिस्ट्रेशन तक नहीं था. इसके बावजूद यूरोपीय संघ ने भारत की अर्जी को रोके रखा और ऐसा प्रतीत होता है कि उसने इस्लामाबाद को अपनी औपचारिकताएं पूरी करने का पूरा मौका दिया. हालांकि भारत और यूरोपीय संघ के बीच इस साल जनवरी में मुक्त व्यापार समझौता (FTA) पूरा हो चुका है, लेकिन GI उत्पादों  के लिए अलग से बातचीत जारी है. यूरोपीय आयोग के आंकड़े बताते हैं कि अन्य व्यापारिक मुद्दों पर चर्चा जारी रहने के बावजूद मार्च 2024 के बाद से GI उत्पादों पर कोई खास बातचीत आगे नहीं बढ़ी है.

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