एग्रीवेट: 14 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: प्राकृतिक खेती में अब मिलेगी एमएससी-पीएचडी की डिग्री, ICAR ने विशेषज्ञों से मांगे सुझाव – देश के कृषि विश्वविद्यालयों में जल्द ही प्राकृतिक खेती पर अलग से एमएससी और पीएचडी पाठ्यक्रम पढ़ाया जा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने इसी महीने की शुरुआत में नई दिल्ली में उद्योग और शिक्षा जगत के विशेषज्ञों के साथ बैठक कर प्रस्तावित पाठ्यक्रम पर उनकी राय मांगी।
बैठक की अध्यक्षता कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर) के सचिव व ICAR महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने की। उन्होंने कहा कि यह पाठ्यक्रम भविष्य की जरूरतों के अनुरूप, वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक और किसानों, उद्योग व समाज से सीधे जुड़ा होना चाहिए। इसमें जैविक आदान, मृदा स्वास्थ्य, प्रमाणन प्रक्रिया, मूल्य श्रृंखला, विपणन और डिजिटल तकनीक जैसे विषय शामिल करने का सुझाव दिया गया।
बैठक का आयोजन ICAR के कृषि शिक्षा प्रभाग ने किया। उप-महानिदेशक (कृषि शिक्षा) डॉ. यशपाल सिंह मलिक ने शुरुआती संबोधन में कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप पाठ्यक्रम बहु-विषयक, कौशल-आधारित और उद्योगोन्मुख होना चाहिए, ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रों को खेत और बाजार, दोनों जगह काम करने लायक समझ मिल सके।
गुजरात प्राकृतिक कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सी.के. टिंबाडिया पाठ्यक्रम निर्माण समिति के अध्यक्ष हैं। उन्होंने और सहायक महानिदेशक डॉ. ए.एस. यादव ने बैठक में प्रस्तावित एमएससी और पीएचडी पाठ्यक्रमों की रूपरेखा रखी और हितधारकों से सुझाव मांगे।
डॉ. जाट ने जोर दिया कि पाठ्यक्रम में रसायन-मुक्त खेती की अलग-अलग विधियों और धाराओं पर स्पष्टता होनी चाहिए, ताकि छात्र जैविक खेती, प्राकृतिक खेती और अन्य तरीकों के बीच का फर्क ठीक से समझ सकें। उद्यमिता और बाजार से जुड़ाव को भी पाठ्यक्रम का जरूरी हिस्सा बताया गया, जिससे पढ़ाई पूरी करने वाले छात्र आगे चलकर किसान उत्पादक संगठनों और प्रमाणन एजेंसियों के साथ भी काम कर सकें।
बैठक में मौजूद उद्योग विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने भी अपनी राय दी, हालांकि इनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। कार्यक्रम के अंत में सहायक महानिदेशक (मानव संसाधन प्रबंधन) डॉ. एस.के. शर्मा ने धन्यवाद प्रस्ताव रखा।
ICAR के अनुसार इस परामर्श से मिले सुझावों को पाठ्यक्रम में शामिल कर इसे समयबद्ध तरीके से अंतिम रूप दिया जाएगा। अभी यह सार्वजनिक नहीं किया गया है कि पाठ्यक्रम किस शैक्षणिक सत्र से शुरू होगा और किन-किन कृषि विश्वविद्यालयों में सबसे पहले पढ़ाया जाएगा।
देश में इस समय कई राज्यों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इसके लिए प्रशिक्षित जनशक्ति की कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी। कृषि विश्वविद्यालयों से हर साल निकलने वाले स्नातक अब तक मुख्यतः परंपरागत रासायनिक खेती की पढ़ाई करते रहे हैं, जबकि खेतों में प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को सलाह देने वाले प्रशिक्षित लोगों की संख्या बहुत कम है।
नया पाठ्यक्रम शुरू होने पर कृषि स्नातकों को खेत स्तर पर प्राकृतिक खेती सलाहकार, प्रमाणन विशेषज्ञ और मूल्य-संवर्धन सलाहकार के तौर पर काम करने का मौका मिल सकेगा। इससे राज्यों में चल रही प्राकृतिक खेती योजनाओं को जमीन पर ठीक से लागू कराने में मदद मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।