एग्रीवेट: 14 अक्टूबर 2026, नबरंगपुर (ओडिशा): मक्के से बदली नबरंगपुर के आदिवासी किसानों की तकदीर, FPO ने दिलाया बाजार – कभी सिर्फ गुजारे भर की खेती के लिए जाना जाने वाला ओडिशा का नबरंगपुर जिला अब राज्य की “मक्का की टोकरी” कहलाता है। यहां करीब 65 हजार हेक्टेयर में मक्के की खेती होती है और सालाना करीब 7.8 लाख मीट्रिक टन पैदावार होती है, जो ओडिशा के कुल मक्का उत्पादन का करीब 30 प्रतिशत है।
जिले के कृषि अधिकारियों के मुताबिक पिछले करीब 12 साल में यहां मक्के की उपज में 50 प्रतिशत से ज्यादा का इजाफा हुआ है। पहले रबी सीजन में प्रति एकड़ अधिकतम 30 क्विंटल तक उपज मिलती थी, जो अब बढ़कर 40 से 45 क्विंटल तक पहुंच गई है। खरीफ सीजन में भी उपज 20 क्विंटल से बढ़कर 25 से 35 क्विंटल प्रति एकड़ हो गई है।
इस बदलाव की बड़ी वजह किसान उत्पादक कंपनियां यानी एफपीओ हैं। जिले में अब तक करीब 15 एफपीओ बन चुके हैं, जिनमें नबरंगी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी और माता डोंगरी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी प्रमुख हैं। साल 2021 में बनी नबरंगी एफपीओ के 700 शेयरधारक हैं, जिनमें से 350 किसान मक्का उगाते हैं, और इसका सालाना कारोबार करीब 4 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। साल 2024 में बनी माता डोंगरी एफपीओ के 842 शेयरधारक हैं।
उमरकोट प्रखंड के कोपेना गांव की किसान लक्ष्मी सांउता सात एकड़ में मक्का उगाती हैं। वे अपनी जमीन से करीब 350 क्विंटल तक उपज लेने का दावा करती हैं और इसे 1,900 से 1,920 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेचती हैं।
किसानों को एफपीओ के जरिए एडीवी759, डीकेसी9126 और सीपी333 जैसी संकर किस्मों के बीज और संगठित बाजार मिल रहा है, जिससे वे बिचौलियों पर निर्भरता कम कर पा रहे हैं। सरकारी ग्रामीण विकास अभिकरण ओरमास के जरिए इन एफपीओ को वित्तीय मदद भी दी गई है। नबरंगी एफपीओ को करीब 61.5 लाख रुपये और माता डोंगरी एफपीओ को करीब 45 लाख रुपये की सहायता मिल चुकी है। मक्का विस्तार कार्यक्रम में केंद्र की दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का भी सहयोग लिया जा रहा है।
ओडिशा सरकार ने 2023 में मुख्यमंत्री मक्का मिशन शुरू किया था, जिसके पहले चरण में राज्य के 15 जिलों के करीब 45 प्रखंड शामिल किए गए। इसके तहत ड्रिप सिंचाई पर 70 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलती है, फिर भी किसानों को प्रति एकड़ 35 से 40 हजार रुपये खुद खर्च करने पड़ते हैं, जो छोटे किसानों के लिए आसान नहीं है।
केंद्र सरकार ने मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य वर्ष 2025-26 के लिए 2,400 रुपये और 2026-27 के लिए 2,410 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, लेकिन जिले के ज्यादातर किसान अधिकतम 2,200 रुपये प्रति क्विंटल तक ही अपनी उपज बेच पाते हैं। एमएसपी की सही जानकारी न होना और बीज के आकार व गुणवत्ता के आधार पर व्यापारियों का भाव घटाना किसानों के लिए अब भी बड़ी समस्या है। जो किसान अपनी लागत नहीं जुटा पाते, उन्हें कई बार स्थानीय महाजनों से करीब पांच प्रतिशत मासिक ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ता है, जिससे उनकी असली कमाई और घट जाती है।