एग्रीवेट: 04 अक्टूबर 2026, नूंह: हरियाणा: ड्रोन दीदी बनकर नूंह की लक्ष्मी ने बदली अपनी पहचान – हरियाणा के नूंह जिले के बसई खानजानदा गांव की लक्ष्मी अब अपने आसपास के गांवों में “ड्रोन दीदी” के नाम से जानी जाती हैं। नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत ड्रोन पायलट बनने के बाद उनकी पहचान और आमदनी दोनों बदल गई है।
बारहवीं पास लक्ष्मी करीब नौ साल पहले हरियाणा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत बने एक स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थीं। जनवरी 2024 में उन्होंने ड्रोन दीदी योजना के तहत ड्रोन पायलट का प्रशिक्षण पूरा किया।
प्रशिक्षण पूरा होने के बाद गरुड़ एयरोस्पेस कंपनी ने लक्ष्मी को कृषि कार्यों के लिए एक ड्रोन उपलब्ध कराया, जिससे वे किसानों के खेतों में कीटनाशक और खाद का छिड़काव करती हैं।
लक्ष्मी अपने आसपास के आठ से दस गांवों में यह सेवा दे रही हैं। उनके मुताबिक जो छिड़काव का काम मजदूरों के जरिए चार से पांच घंटे में होता था, वही काम अब ड्रोन से महज 30 से 40 मिनट में पूरा हो जाता है।
लक्ष्मी को इस काम से साल 2025 में 60 हजार रुपये की कमाई हुई थी, जबकि इस साल अब तक उनकी कमाई 75 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है।
लक्ष्मी कहती हैं कि इस योजना ने उन्हें रोजगार के साथ-साथ आत्मविश्वास और समाज में सम्मान भी दिया है। उनका कहना है कि इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है।
आसपास के गांवों में अब लक्ष्मी को उनके नाम से कम, बल्कि “ड्रोन दीदी” के नाम से ज्यादा जाना जाता है। यह पहचान उनके लिए गांव में एक नए सम्मान जैसी है।
लक्ष्मी की यह यात्रा आसान नहीं रही। करीब नौ साल पहले जब वे हरियाणा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थीं, तब उनके पास न तो कोई खास हुनर था और न ही नियमित आमदनी का जरिया। समूह के जरिए मिलने वाले छोटे-छोटे प्रशिक्षण और कामों से उन्होंने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई।
नमो ड्रोन दीदी योजना केंद्र सरकार की उस पहल का हिस्सा है, जिसके तहत देश भर में ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को खेती में ड्रोन के इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। इसका मकसद एक तरफ महिलाओं को तकनीक से जोड़कर रोजगार देना है, तो दूसरी तरफ किसानों को खेतों में छिड़काव का काम तेज, सुरक्षित और कम खर्च में उपलब्ध कराना है।
लक्ष्मी बताती हैं कि ड्रोन से छिड़काव करने पर दवा और पानी की खपत भी मैनुअल छिड़काव के मुकाबले कम होती है, और खेत में हर जगह एक समान मात्रा में छिड़काव हो पाता है। इससे किसानों को समय और लागत दोनों में बचत होती है।
इसके अलावा ड्रोन से छिड़काव करने पर मजदूरों को सीधे कीटनाशक के संपर्क में आने का खतरा भी कम हो जाता है, जो मैनुअल छिड़काव के दौरान एक बड़ी चिंता रहती है। आसपास के गांवों के किसान अब खेत में काम के लिए सीधे लक्ष्मी से संपर्क करते हैं और समय से पहले अपनी बारी बुक करा लेते हैं।
नूंह जैसे इलाके में, जहां पहले महिलाओं का घर से बाहर निकलकर अकेले काम करना आसान नहीं माना जाता था, वहां लक्ष्मी का ड्रोन चलाना और अपने दम पर कमाई करना गांव की दूसरी महिलाओं के लिए भी एक उदाहरण बन गया है। स्वयं सहायता समूह से जुड़ी कुछ और महिलाएं भी अब ड्रोन पायलट प्रशिक्षण में दिलचस्पी दिखा रही हैं।
लक्ष्मी का कहना है कि शुरुआत में परिवार और गांव के कुछ लोगों को उनके इस काम पर भरोसा नहीं था, लेकिन जब उन्हें नियमित आमदनी होने लगी और आसपास के किसान उनके काम से संतुष्ट नजर आए, तो धीरे-धीरे यह भरोसा भी बढ़ने लगा। अब वे चाहती हैं कि आने वाले समय में और ज्यादा गांवों तक अपनी सेवा पहुंचा सकें।