कश्मीर के पश्मीना-केसर की विदेशों में बढ़ेगी मांग, लेकिन असली उत्पादों की पहचान पर संकट!—देखें क्या है पूरा सच – एग्रीवेट

Team Agrivate
6 Min Read

एग्रीवेट: Kashmir GI Tag Products: जम्मू-कश्मीर के कश्मीरी पश्मीना, केसर, कालीन और पारंपरिक हस्तशिल्प को देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचाने की तैयारी तेज हो रही है. सरकार खरीदार-विक्रेता बैठकें और व्यापारिक कार्यक्रम आयोजित कर स्थानीय उत्पादकों, कारीगरों और निर्यातकों को नए बाजारों से जोड़ने की कोशिश कर रही है. हालांकि, GI टैग वाले उत्पादों की असली पहचान बनाए रखना और उनके प्रमाणन में होने वाली देरी बड़ी चुनौती बनी हुई है. जांच की सीमित सुविधाओं के कारण कारोबारियों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में सवाल है कि कश्मीर के पारंपरिक उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान दिलाने के लिए किन कदमों की जरूरत है?

बिजनेस लाइन के अनुसार , जम्मू-कश्मीर के कम से कम 25 उत्पादों को भौगोलिक संकेतक  यानी GI टैग मिल चुका है. इनमें पश्मीना, कश्मीरी केसर, कानी शॉल, कालीन, पेपर मेशी और अखरोट की लकड़ी पर की जाने वाली नक्काशी जैसे उत्पाद शामिल हैं. इनकी खासियत स्थानीय परंपराओं, कारीगरी और उत्पादन क्षेत्र से जुड़ी है. GI टैग किसी उत्पाद की उस विशिष्ट पहचान को दर्शाता है, जो उसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषताओं के कारण किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है. इससे ग्राहकों को उत्पाद की क्षेत्रीय पहचान समझने में मदद मिलती है. साथ ही, स्थानीय कारीगरों और उत्पादकों को अपने पारंपरिक सामान की अलग पहचान बनाने का अवसर मिलता है.

बिजनेस लाइन के अनुसार,  हाल ही में श्रीनगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय खरीदार-विक्रेता बैठक  में कश्मीर के पारंपरिक उत्पादों को प्रदर्शित किया गया. इसमें देश के अलग-अलग हिस्सों और विदेशी बाजारों से आए खरीदारों ने हिस्सा लिया. इस तरह के कार्यक्रमों का उद्देश्य स्थानीय कारोबारियों को नए खरीदारों से जोड़ना और उत्पादों की बिक्री के अवसर बढ़ाना है. निर्यातक और कश्मीर इकोनॉमिक एलायंस के प्रवक्ता काजी तौसीफ ने बिजनेस लाइन को बताया कि GI टैग वाले उत्पादों को खरीदारों से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है. खासकर कश्मीरी पश्मीना के मामले में प्रमाणन और जांच से ग्राहकों का भरोसा बढ़ाने में मदद मिलती है. इससे असली उत्पादों की पहचान मजबूत करने और बाजार में उनकी प्रतिष्ठा बनाए रखने का अवसर मिलता है.

GI टैग वाले उत्पादों  की पहचान मजबूत करने के लिए उनकी प्रामाणिकता की जांच जरूरी है. हालांकि, जांच सुविधाओं की कमी इस प्रक्रिया को मुश्किल बना रही है. काजी तौसीफ के मुताबिक, पश्मीना जैसे उत्पादों की जांच के लिए केवल एक प्रयोगशाला उपलब्ध है और प्रमाणन की प्रक्रिया पूरी होने में कई महीने लग सकते हैं. इस देरी से उन कारीगरों, उत्पादकों और निर्यातकों को परेशानी हो सकती है, जो अपने सामान का प्रमाणन कराकर नए बाजारों में बिक्री करना चाहते हैं. हालांकि, लंबित जांच के मामलों की संख्या और इसके कारण प्रभावित हुए ऑर्डर या शिपमेंट का स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. इसके बावजूद, जांच की क्षमता बढ़ाना कारोबार को गति देने के लिए अहम माना जा रहा है.

कश्मीर के पारंपरिक उत्पादों  के कारोबार में एक बड़ी चुनौती उनकी असली पहचान को सुरक्षित रखना है. कश्मीर के बाहर बने सामान को भी कश्मीर से जुड़े नामों के तहत बेचे जाने की आशंका स्थानीय उत्पादकों की चिंता बढ़ाती है. इससे असली उत्पादों की प्रतिष्ठा और ग्राहकों का भरोसा प्रभावित हो सकता है. केवल GI टैग मिलना ही पर्याप्त नहीं है. इसके लिए नियमित जांच, प्रमाणन और नियमों का प्रभावी पालन भी जरूरी है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में जगह बनाने के लिए उत्पादों की गुणवत्ता, पैकेजिंग, कीमत और समय पर आपूर्ति पर भी ध्यान देना होगा. यदि जांच सुविधाओं का विस्तार किया जाए और गलत नाम से उत्पाद बेचने पर निगरानी मजबूत हो, तो कश्मीर के किसानों, कारीगरों और निर्यातकों को नए बाजारों तक पहुंचने तथा कारोबार बढ़ाने के बेहतर अवसर मिल सकते हैं.

Share This Article