एग्रीवेट: Sheep Breeding: जम्मू-कश्मीर में भेड़ों की नस्ल सुधारने के लिए भ्रूण स्थानांतरण तकनीक (ETT) का इस्तेमाल शुरू हो गया है. पशुपालन विभाग के अनुसार, जकूरा स्थित भ्रूण स्थानांतरण तकनीक प्रयोगशाला से अक्टूबर 2025 से प्रगतिशील किसानों को यह सुविधा मुफ्त दी जा रही है. इसके जरिए किसानों के झुंड में शुद्ध नस्ल के टेक्सल और ऑस्ट्रेलियन मेरिनो मेमने पैदा हुए हैं. विभाग के अनुसार, यह तकनीक पारंपरिक ब्रीडिंग की तुलना में आनुवंशिक सुधार की रफ्तार को करीब 5 से 6 गुना तक तेज कर सकती है.
पशुपालन विभाग के अनुसार, अक्टूबर 2025 से जकूरा स्थित ETT लैब के माध्यम से प्रगतिशील किसानों को भ्रूण स्थानांतरण की सुविधा मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही है. इस तकनीक में बेहतर आनुवंशिक गुण वाले पशुओं से प्राप्त भ्रूण को दूसरी मादा भेड़ में स्थानांतरित किया जाता है. इससे अच्छी नस्ल के गुणों को तेजी से आगे बढ़ाने में मदद मिलती है. विभाग के मुताबिक, इस तकनीक के जरिए कुछ किसानों के झुंड में टेक्सल और ऑस्ट्रेलियन मेरिनो जैसी शुद्ध नस्लों के मेमने जन्म ले चुके हैं.
अब तक भेड़ों की नस्ल सुधारने के लिए किसान मुख्य रूप से अच्छी नस्ल के एलीट नर मेढ़ों का इस्तेमाल करते थे. लेकिन इस तरीके में कई सीमाएं हैं. एलीट मेढ़ों की संख्या सीमित होने के कारण सभी किसानों तक उनकी पहुंच नहीं बन पाती थी. इसके अलावा, ब्रीडिंग पर नियंत्रण कम रहता था और नई पीढ़ी तैयार होने में लंबा समय लगता था. पशुपालन विभाग के अनुसार, ETT तकनीक इन समस्याओं को कम करने में मदद कर सकती है. इससे बेहतर आनुवंशिक गुणों वाले भ्रूणों को ज्यादा संख्या में इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे मादा भेड़ों की आनुवंशिक क्षमता का भी बेहतर इस्तेमाल संभव होता है.
जम्मू-कश्मीर में भेड़ पालन की प्राथमिकताओं में भी बदलाव देखने को मिल रहा है. पहले ब्रीडिंग कार्यक्रमों में मेरिनो और कॉरीडेल जैसी ऊन देने वाली नस्लों पर अधिक ध्यान दिया जाता था. अब मटन की बढ़ती मांग को देखते हुए मांस उत्पादन के लिए बेहतर नस्लों को बढ़ावा दिया जा रहा है. पशुपालन विभाग के अनुसार, HADP प्रोजेक्ट 24 के तहत टेक्सल, डॉर्पर, रोमानोव और फिन जैसी मटन नस्लों को शामिल किया गया है. जम्मू-कश्मीर में करीब 43.68 लाख भेड़ें और 22.5 लाख बकरियां हैं. यहां हर साल करीब 370 लाख किलोग्राम मटन और 80 लाख किलोग्राम से ज्यादा ऊन का उत्पादन होता है.
पशुपालन विभाग के अनुसार, ETT तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ नस्ल सुधार तक सीमित नहीं रहेगा. भ्रूण और वीर्य को क्रायोप्रिजर्व यानी कम तापमान पर सुरक्षित रखकर भविष्य में इस्तेमाल और आनुवंशिक सामग्री के संरक्षण में भी मदद ली जा सकती है. इससे जीवित पशुओं को दूसरे स्थानों पर ले जाने की जरूरत कम होगी और बीमारी फैलने का जोखिम भी घट सकता है. सरकार अब इस तकनीक को बड़े स्तर पर पहुंचाने की तैयारी कर रही है. इसके लिए तीन साल में 63.14 करोड़ रुपये की लागत से चरणबद्ध तरीके से 20 जिला ETT प्रयोगशालाएं स्थापित करने की योजना है. पशुपालन विभाग के अनुसार, इसका उद्देश्य बेहतर नस्ल की भेड़ों का स्थानीय स्तर पर स्रोत तैयार करना, विदेशी नस्लों के आयात पर निर्भरता घटाना और मटन व ऊन की उत्पादकता बढ़ाना है.