एग्रीवेट: 26 सितंबर 2026, जबलपुर: 0.25 एकड़ के बेकार तालाब से हल्कू बरमन ने निकाला सिंघाड़ा-मछली का दोहरा मुनाफा – जबलपुर जिले के शाहपुरा ब्लॉक के भीटा गांव के किसान हल्कू बरमन के पास कुल तीन एकड़ जमीन है, जिसमें से 0.25 एकड़ का एक टुकड़ा हंसिए के आकार का और जलजमाव वाला था। इस टुकड़े पर मशीन से धान की कटाई मुमकिन नहीं थी, जिससे यह जमीन लंबे समय तक घाटे का सौदा बनी रही।
बरमन ने इस समस्या से हार मानने के बजाय इस जमीन का इस्तेमाल पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने इसी टुकड़े पर तालाब बनाकर उसमें सिंघाड़े की खेती और मछली पालन एक साथ शुरू किया। इस मॉडल से उन्हें हर सीजन सिंघाड़े से 30 से 40 हजार रुपये और मछली बिक्री से 25 से 30 हजार रुपये यानी कुल मिलाकर करीब 70 हजार रुपये सालाना अतिरिक्त आय होने लगी, जो पहले इसी जमीन से लगभग शून्य के बराबर थी।
बरमन अपनी बाकी करीब पौने तीन एकड़ जमीन पर मटर, सब्जियां और उड़द की फसल चक्र के साथ खेती करते हैं, और खाद के तौर पर गोबर व गोमूत्र आधारित जैविक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। जिस टुकड़े को पहले बेकार माना जाता था, वहीं तालाब बनाकर सिंघाड़ा और मछली का यह संयुक्त मॉडल खड़ा किया गया, जिससे उस जमीन की उपज दोगुनी हो गई। सिंघाड़ा और मछली पालन एक ही तालाब में साथ-साथ चलने से पानी और जगह दोनों का पूरा इस्तेमाल हो जाता है, जबकि अलग-अलग खेती करने पर इतनी ही जमीन से इतनी आमदनी मुमकिन नहीं थी।
कृषि विभाग की अधिकारी डॉ. इंदिरा त्रिपाठी और एस.के. परतेती ने खुद खेत का निरीक्षण कर इस मॉडल को सराहा है। उनके मुताबिक यह तरीका उन किसानों के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है जिनके पास जलजमाव वाली या मशीन से जोताई के लिहाज से अनुपयुक्त छोटी जमीन के टुकड़े हैं, जिन्हें आमतौर पर किसान परती छोड़ देते हैं या मुश्किल से एक फसल ले पाते हैं। बरमन की कुल सालाना आमदनी, उनकी सभी खेती गतिविधियों को मिलाकर, करीब 4 लाख रुपये आंकी गई है।
सिंघाड़े की खेती में पौधों को तालाब के पानी में रोपा जाता है और फल पानी की सतह के पास ही तैयार होता है, जिससे इसकी तुड़ाई के लिए किसी बड़ी मशीन की जरूरत नहीं पड़ती और हाथ से ही काम चल जाता है। इस तरह एक ही तालाब में सिंघाड़े की बेल और मछली दोनों साथ-साथ पल जाते हैं, जिससे जमीन और पानी दोनों का पूरा इस्तेमाल हो जाता है और अलग-अलग खेती करने की तुलना में मेहनत भी बंट जाती है।