धान की पराली के बीच गेहूँ में गुल्ली-डंडा नियंत्रण: मेट्रिब्यूजिन के सही समय और प्रयोग विधि का महत्व – एग्रीवेट

Team Agrivate
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धान की पराली के बीच गेहूँ में गुल्ली-डंडा नियंत्रण: मेट्रिब्यूजिन के सही समय और प्रयोग विधि का महत्व - एग्रीवेट

एग्रीवेट: लेखक: ईशा अहलावत, बी. आर. कंबोज एवं धर्मबीर यादव, सस्य विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा

24 सितंबर 2026, नई दिल्ली: धान की पराली के बीच गेहूँ में गुल्ली-डंडा नियंत्रण: मेट्रिब्यूजिन के सही समय और प्रयोग विधि का महत्व –

धान-गेहूँ फसल प्रणाली उत्तर-पश्चिमी भारत, विशेषकर हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है। इस प्रणाली में गेहूँ की सफल खेती के लिए समय पर बुवाई, उचित सिंचाई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन के साथ-साथ खरपतवार नियंत्रण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गेहूँ में पाया जाने वाला गुल्ली-डंडा (Phalaris minor Retz.) इस क्षेत्र का प्रमुख एवं कठिनाई पैदा करने वाला संकरी पत्ती वाला खरपतवार है।

गुल्ली-डंडा गेहूँ के पौधों से अत्यधिक मिलता-जुलता है। प्रारंभिक अवस्था में इसे पहचानना कठिन होता है और खेत में अधिक संख्या में होने पर यह गेहूँ की वृद्धि, पोषक तत्वों, पानी, प्रकाश तथा स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करता है। अनियंत्रित स्थिति में यह गेहूँ की उपज में भारी कमी कर सकता है।

आज खेती में एक और महत्वपूर्ण बदलाव आया है—धान की पराली को खेत में ही रखते हुए जीरो-टिलेज मशीनों से गेहूँ की बुवाई। यह तकनीक पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने, समय एवं ईंधन की बचत तथा मृदा स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। लेकिन पराली की मोटी परत के कारण खरपतवारनाशी के खेत तक पहुँचने और उसके प्रभावी ढंग से काम करने की स्थिति पारंपरिक खेती से अलग हो जाती है। इसलिए ऐसे खेतों में खरपतवार नियंत्रण के लिए केवल सही दवा चुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि दवा की सही मात्रा, सही समय और सही प्रयोग विधि भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

धान-गेहूँ प्रणाली में लंबे समय तक गेहूँ की लगातार खेती, समान प्रकार के खरपतवारनाशियों का बार-बार प्रयोग, देर से गेहूँ की बुवाई तथा गलत मात्रा अथवा गलत तरीके से दवा का प्रयोग गुल्ली-डंडा नियंत्रण को कठिन बना सकता है।

विशेष रूप से कुछ क्षेत्रों में गुल्ली-डंडा में विभिन्न समूहों के खरपतवारनाशियों के प्रति प्रतिरोध विकसित हुआ है। हरियाणा में किए गए एक सर्वेक्षण में किसानों द्वारा खरपतवारनाशी की मात्रा और छिड़काव तकनीक में काफी भिन्नता पाई गई तथा देर से प्रयोग और गलत नोजल जैसे कारणों से खरपतवार नियंत्रण प्रभावित होने की बात सामने आई।

जीरो-टिलेज में धान की पराली को खेत की सतह पर बनाए रखना संरक्षण कृषि की महत्वपूर्ण तकनीक है। पराली की सतह पर बनी परत मिट्टी की नमी और तापमान को नियंत्रित करने में सहायता करती है तथा कई परिस्थितियों में खरपतवारों के अंकुरण एवं स्थापना को भी प्रभावित करती है।

किसानों के खेतों में किए गए अध्ययनों में धान की पर्याप्त मात्रा में पराली को सतह पर रखने और समय पर गेहूँ की बुवाई करने से गुल्ली-डंडा सहित कुछ खरपतवारों की संख्या में कमी देखी गई है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पराली होने पर खरपतवार की समस्या समाप्त हो जाती है। पराली खरपतवार प्रबंधन का एक घटक है, पूर्ण समाधान नहीं। विशेष रूप से जहां गुल्ली-डंडा का दबाव अधिक हो, वहां वैज्ञानिक खरपतवारनाशी प्रबंधन आवश्यक हो जाता है।

मेट्रिब्यूजिन (Metribuzin) गेहूँ में प्रयोग किया जाने वाला महत्वपूर्ण खरपतवारनाशी है, जो गुल्ली-डंडा के साथ-साथ कई चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण में भी उपयोगी हो सकता है।

पुराने अध्ययनों में भी मेट्रिब्यूजिन को गेहूँ में Phalaris minor के नियंत्रण के लिए प्रभावी पाया गया है तथा इसके प्रयोग का समय इसकी प्रभावशीलता को प्रभावित करता है।

लेकिन मेट्रिब्यूजिन की सफलता केवल “कितनी दवा डालनी है” पर निर्भर नहीं करती। खासकर धान की पराली वाले जीरो-टिलेज खेत में यह जानना आवश्यक है कि—

इन्हीं प्रश्नों को ध्यान में रखते हुए हमारा शोध कार्य किया गया।

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के धान अनुसंधान केन्द्र, कौल (कैथल), हरियाणा में दो लगातार रबी मौसमों—2021–22 और 2022–23—में अध्ययन किया गया।

इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य था कि धान की पराली को खेत में बनाए रखते हुए जीरो-टिलेज गेहूँ में मेट्रिब्यूजिन के लिए उचित मात्रा, प्रयोग का समय तथा प्रयोग विधि निर्धारित की जाए। साथ ही, मेट्रिब्यूजिन को पिनोक्साडेन के साथ प्रयोग करने की प्रभावशीलता का भी अध्ययन किया गया।

मेट्रिब्यूजिन को अलग-अलग समय एवं विधियों—जैसे पूर्व-उद्भव तथा बाद-उद्भव प्रयोग, स्प्रे, रेत-मिश्रण और यूरिया-मिश्रण के साथ प्रसारण—के रूप में जांचा गया।

शोध में पाया गया कि धान की पराली को बनाए रखते हुए जीरो-टिलेज गेहूँ में मेट्रिब्यूजिन का बाद-उद्भव प्रयोग विशेष रूप से प्रभावी रहा।

को गेहूँ की बुवाई के 35 दिन बाद यूरिया के साथ मिलाकर प्रसारित करना तथा उसी समय पिनोक्साडेन 50 ग्राम सक्रिय तत्व/हेक्टेयर का छिड़काव करना गुल्ली-डंडा और प्रमुख चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के प्रभावी नियंत्रण में उपयोगी पाया गया।

इस उपचार में 90 दिन बाद गुल्ली-डंडा की संख्या दोनों वर्षों में क्रमशः लगभग 1.8 और 4.1 पौधे प्रति वर्ग मीटर रही। साथ ही प्रमुख चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों—Medicago denticulata, Rumex dentatus तथा Melilotus indica—का भी अच्छा नियंत्रण प्राप्त हुआ।

एक अन्य संबंधित अध्ययन में इसी प्रकार के उपचार से जीरो-टिलेज गेहूँ में लगभग 5.57 टन/हेक्टेयर अनाज उपज प्राप्त हुई तथा आर्थिक लाभ भी अधिक रहा।

यहां दोनों खरपतवारनाशियों की भूमिका अलग-अलग समझना महत्वपूर्ण है।

पिनोक्साडेन मुख्य रूप से संकरी पत्ती वाले खरपतवारों, विशेषकर गुल्ली-डंडा, के नियंत्रण में प्रभावी है। लेकिन यह चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर प्रभावी नहीं होता।

दूसरी ओर, मेट्रिब्यूजिन गुल्ली-डंडा के साथ कई चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नियंत्रित करने में सहायता करता है।

इस प्रकार दोनों का उचित समय और विधि से प्रयोग खेत में उपस्थित संकरी तथा चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के मिश्रित समूह के प्रबंधन में अधिक उपयोगी हो सकता है। हमारे अध्ययन में भी पिनोक्साडेन अकेले ने गुल्ली-डंडा पर अच्छा नियंत्रण दिया, जबकि मेट्रिब्यूजिन के संयोजन से खरपतवार नियंत्रण का दायरा बढ़ा।

1. केवल दवा नहीं, सही तकनीक जरूरी है

खरपतवारनाशी की सफलता के लिए केवल अच्छी कंपनी की दवा खरीदना पर्याप्त नहीं है। सही मात्रा + सही समय + सही विधि + उचित नोजल/उपकरण का पालन करना जरूरी है।

गुल्ली-डंडा की अधिक विकसित अवस्था तक इंतजार करने पर खरपतवारनाशी की प्रभावशीलता कम हो सकती है। इसलिए खेत की नियमित निगरानी करें और अनुशंसित अवस्था पर ही नियंत्रण करें।

पराली को खेत में बनाए रखते हुए जीरो-टिलेज गेहूँ की बुवाई करने से संसाधनों की बचत, मृदा संरक्षण और वायु प्रदूषण में कमी जैसे लाभ प्राप्त होते हैं। लेकिन पराली प्रबंधन के साथ खरपतवार प्रबंधन की उचित योजना बनाना भी जरूरी है।

कम मात्रा से खरपतवार बच सकते हैं और बार-बार गलत मात्रा का प्रयोग प्रतिरोध के विकास का जोखिम बढ़ा सकता है। वहीं अधिक मात्रा से फसल पर प्रतिकूल प्रभाव और अनावश्यक लागत बढ़ सकती है। हरियाणा में किए गए सर्वेक्षण में कुछ किसानों द्वारा अनुशंसित मात्रा से कई गुना अधिक मात्रा प्रयोग किए जाने की समस्या भी सामने आई है।

गुल्ली-डंडा में विभिन्न खरपतवारनाशी समूहों के प्रति प्रतिरोध की समस्या रिपोर्ट की जा चुकी है। इसलिए एकीकृत खरपतवार प्रबंधन (Integrated Weed Management)—समय पर बुवाई, उचित फसल चक्र, जीरो-टिलेज, पराली प्रबंधन तथा आवश्यकता के अनुसार प्रभावी खरपतवारनाशियों का विवेकपूर्ण प्रयोग—दीर्घकालीन समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण है।

धान की पराली को खेत में रखकर गेहूँ की जीरो-टिलेज बुवाई आज उत्तर-पश्चिमी भारत में टिकाऊ कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन खेती की यह नई व्यवस्था खरपतवार प्रबंधन के लिए भी नई रणनीति की मांग करती है।

“पराली बचाएं, मिट्टी बचाएं और खरपतवार को समय पर नियंत्रित करें”—इन तीनों को एक साथ अपनाकर किसान उत्पादन लागत, पर्यावरणीय दबाव और खरपतवार की समस्या को कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

हमारे शोध से यह स्पष्ट हुआ कि धान की पराली वाले जीरो-टिलेज गेहूँ में मेट्रिब्यूजिन के प्रभावी उपयोग के लिए समय और प्रयोग विधि का अनुकूलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से 35 दिन बाद मेट्रिब्यूजिन को यूरिया के साथ प्रसारित करने और पिनोक्साडेन के उपयुक्त प्रयोग ने गुल्ली-डंडा तथा प्रमुख चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के प्रबंधन में आशाजनक परिणाम दिए।

“खरपतवारनाशी की अधिक मात्रा नहीं, बल्कि सही खरपतवारनाशी का सही समय और सही विधि से प्रयोग ही सफल खरपतवार प्रबंधन की कुंजी है।”

निष्कर्ष गुल्ली-डंडा आज भी गेहूँ की उत्पादकता के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है, विशेषकर धान-गेहूँ प्रणाली में। धान की पराली को खेत में रखते हुए जीरो-टिलेज गेहूँ की खेती इस चुनौती को एक नई दिशा देती है। ऐसी परिस्थितियों में मेट्रिब्यूजिन का उचित समय और प्रयोग विधि से उपयोग तथा आवश्यकता के अनुसार पिनोक्साडेन का समावेश प्रभावी खरपतवार प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है I

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