एग्रीवेट: मध्य प्रदेश में किसानों के लिए पॉलीहाउस बनाने के नाम पर करीब 9.71 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी का मामला सामने आया है. आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने इस मामले में चार निजी कंपनियों, उनके पार्टनरों और बैंक ऑफ बड़ौदा के तीन अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की है. EOW के मुताबिक, बैंक की खरगोन शाखा से 33 किसानों के नाम पर कुल 7.81 करोड़ रुपये का लोन मंजूर कर बांटा गया. आरोप है कि जिन पॉलीहाउस के लिए यह लोन लिया गया, उनमें कुछ अधूरे थे, जबकि कुछ का निर्माण हुआ ही नहीं था.
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जांच एजेंसी का आरोप है कि कंपनियों ने किसानों के नाम और जमीन से जुड़े दस्तावेजों का इस्तेमाल कर लोन हासिल किया. इसके बाद फर्जी दस्तावेजों के जरिए लोन की रकम का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल किया गया. EOW के मुताबिक, जिन किसानों के नाम पर लोन लिया गया, वे खुद भी कथित तौर पर इस धोखाधड़ी का शिकार हुए हैं. आरोप है कि कंपनियों ने किसानों का भरोसा जीतकर उनके जमीन से जुड़े दस्तावेज ले लिए. इसके बाद उन्हीं के नाम पर लोन लिया गया. लोन की रकम का गलत इस्तेमाल होने के बाद किसानों पर कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी आ गई.
प्राथमिकी (एफआईआर) में चार निजी कंपनियों के नाम शामिल हैं. इनमें राज इको फार्म्स और उसके पार्टनर राजेंद्र सिंह तंवर और नितिन गावशिंदे भी शामिल हैं. EOW के अनुसार, AVI एग्रीटेक सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड को पांच पॉलीहाउस बनाने का ठेका मिला था. आरोप है कि कंपनी ने इनमें से सिर्फ तीन पॉलीहाउस बनाए, लेकिन सभी पांच के निर्माण का काम पूरा होने का प्रमाण पत्र जमा कर दिया. EOW के मुताबिक, एक अन्य आरोपी फर्म किसान एग्रो को 20 पॉलीहाउस बनाने का ठेका दिया गया था. यह फर्म नरेंद्र पवार की है. आरोप है कि इनमें से एक भी पॉलीहाउस नहीं बनाया गया. इसके बावजूद सभी 20 पॉलीहाउस के निर्माण का फर्जी प्रमाण पत्र तैयार कर भुगतान हासिल किया गया.
प्राथमिकी (एफआईआर) में इंदौर की सिरांश टेक्नो इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक सौरभ दुबे का नाम भी शामिल है. EOW का आरोप है कि कंपनी ने आठ ऐसे पॉलीहाउस के लिए फर्जी निर्माण प्रमाण पत्र का इस्तेमाल किया, जिनका निर्माण हुआ ही नहीं था. जांच एजेंसी ने 33 लोन फाइलों की जांच की. इसमें निर्माण पूरा होने के प्रमाण पत्रों की तारीखों में गड़बड़ी मिली. EOW के अनुसार, सिर्फ तीन मामलों में प्रमाण पत्र की तारीख और लोन की रकम जारी होने की तारीख एक जैसी थी.
EOW के मुताबिक, 12 मामलों में पॉलीहाउस निर्माण के प्रमाण पत्र लोन की रकम जारी होने से पहले की तारीख के थे. वहीं, 16 मामलों में प्रमाण पत्र की तारीख लोन मंजूर होने से भी पहले की थी. जांच एजेंसी का कहना है कि इससे संकेत मिलता है कि निर्माण पूरा होने और उसकी जांच के बाद प्रमाण पत्र जारी नहीं किए गए थे. आरोप है कि लोन की रकम जारी कराने के लिए ये प्रमाण पत्र तैयार किए गए. प्राथमिकी (एफआईआर) में बैंक ऑफ बड़ौदा के तीन अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं. इनमें तत्कालीन चीफ ब्रांच मैनेजर केके सरवटे, तत्कालीन लोन मैनेजर शुभम सोहनी और अधिकारी चंद्रशेखर राठौड़ शामिल हैं. EOW का आरोप है कि अधिकारियों ने पॉलीहाउस बने हैं या नहीं, इसकी जांच किए बिना लोन मंजूर और जारी किए. दस्तावेजों में गड़बड़ी होने के बावजूद लोन आवेदनों को मंजूरी दी गई.