एग्रीवेट: Ethanol Industry Maize Demand: मक्का को लेकर पशु आहार उद्योग की चिंता बढ़ गई है. दरअसल, एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों की ओर से मक्का की मांग बढ़ने की संभावना है, जबकि इस साल देश में मक्का की खेती का रकबा पिछले साल के मुकाबले कम हुआ है. ऐसे में फीड उद्योग को डर है कि अगर एथेनॉल कंपनियों ने बड़ी मात्रा में मक्का खरीदा तो पशु और पोल्ट्री फीड बनाने वालों के लिए इसकी उपलब्धता कम पड़ सकती है. क्लफ्मा ऑफ इंडिया (CLFMA of India) ने सरकार से मांग की है कि एथेनॉल और पशु आहार, दोनों उद्योगों की जरूरत को देखते हुए मक्का की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जाए. उद्योग का कहना है कि एथेनॉल के लिए चावल और दूसरे अनाज जैसे विकल्प मौजूद हैं, लेकिन पशु आहार में मक्का की जगह लेना आसान नहीं है. मक्का पशु आहार का एक प्रमुख कच्चा माल है. खासकर पोल्ट्री फीड में इसकी हिस्सेदारी करीब 50 से 60 फीसदी तक बताई जाती है. वहीं, मुर्गी पालन में कुल लागत का करीब 60 से 70 फीसदी हिस्सा फीड पर खर्च होता है. इसलिए अगर मक्का के दाम बढ़ते हैं तो इसका असर सीधे पोल्ट्री कारोबार की लागत पर पड़ सकता है. चारा महंगा होने पर अंडे और चिकन के उत्पादन की लागत भी बढ़ने की आशंका रहती है. मक्का की उपलब्धता को लेकर चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि इस साल इसकी खेती का क्षेत्र घटा है. कृषि मंत्रालय के 11 सितंबर तक के आंकड़ों के मुताबिक, देश में मक्का का रकबा 91.59 लाख हेक्टेयर रहा. पिछले साल इसी समय यह करीब 94.08 लाख हेक्टेयर था. यानी रकबे में करीब 2.64 फीसदी की कमी आई है. राज्यों की बात करें तो कर्नाटक में मक्का का रकबा करीब 21 फीसदी घटकर 13.38 लाख हेक्टेयर रह गया. महाराष्ट्र में भी करीब 11 फीसदी की कमी के साथ रकबा 12.98 लाख हेक्टेयर रहा. मध्य प्रदेश में मक्का का क्षेत्र करीब 2 फीसदी घटकर 26.4 लाख हेक्टेयर रह गया. रकबा कम होने के साथ मौसम को लेकर भी चिंता है. बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार पशु आहार उद्योग के मुताबिक, इस साल कई इलाकों में बारिश कमजोर और देर से हुई है. इससे मक्का की फसल की पैदावार प्रभावित होने का खतरा है. CLFMA की ओर से सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर कराए जा रहे फसल सर्वे में भी रकबे में कमी के संकेत मिले हैं. शुरुआती चरण में करीब 14 फीसदी की कमी का अनुमान सामने आया था. बाद के में यह अंतर करीब 8 से 9 फीसदी तक रहने की संभावना जताई गई. उद्योग के अनुमान के मुताबिक, अगर रकबे के साथ प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी घटता है तो इस साल देश में मक्का की कुल उपलब्धता 11 से 12 फीसदी तक कम हो सकती है. नई फसल की आवक से पहले ही मक्का के भाव ऊंचे बने हुए हैं. उद्योग के मुताबिक, मक्का की कीमत फिलहाल करीब 2,700 से 2,800 रुपये प्रति क्विंटल है. अगर आने वाले समय में एथेनॉल कंपनियों की खरीद बढ़ती है और उत्पादन उम्मीद से कम रहता है, तो मक्का के लिए खरीदारी की होड़ बढ़ सकती है. इससे कीमतों पर और दबाव आने की आशंका है. एथेनॉल उत्पादन में मक्का का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है. ऐसे में अगर एथेनॉल कंपनियां बड़ी मात्रा में मक्का खरीदती हैं तो फीड उद्योग को उसी उपलब्ध स्टॉक के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है. CLFMA ने सरकार से इसी वजह से दोनों क्षेत्रों के बीच संतुलन बनाने की मांग की है. उद्योग का कहना है कि एथेनॉल के लिए दूसरे अनाजों का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन पशु आहार उद्योग की मक्का पर निर्भरता ज्यादा है. देश में पशु आहार की मांग भी लगातार बढ़ रही है. CLFMA के अनुमान के मुताबिक, भारत का पशु आहार बाजार 2025 में करीब 5.773 करोड़ टन तक पहुंच गया था. 2020 से 2025 के बीच इसमें करीब 8 फीसदी सालाना की दर से बढ़ोतरी हुई. आने वाले वर्षों में पशुपालन और पोल्ट्री क्षेत्र के विस्तार के साथ फीड की मांग और बढ़ने की उम्मीद है. उद्योग के अनुमानों के मुताबिक 2026 से 2030 के बीच पशु आहार बाजार में करीब 9.7 फीसदी सालाना वृद्धि हो सकती है. ऐसे में मक्का की उपलब्धता सिर्फ एथेनॉल उद्योग के लिए ही नहीं, बल्कि पशुपालन और पोल्ट्री कारोबार के लिए भी अहम है.