पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में तेजी, 1610 के पार पहुंचा आंकड़ा.. तरनतारन सबसे आगे – एग्रीवेट

Team Agrivate
6 Min Read

एग्रीवेट: पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में एक बार फिर तेजी आई है. सोमवार को राज्य में पराली जलाने के 98 नए मामले सामने आए. इसके साथ ही इस सीजन में खेतों में आग लगाने की कुल घटनाओं की संख्या बढ़कर 1,612 हो गई है. इससे एक दिन पहले रविवार को राज्य में पराली जलाने के 175 मामले दर्ज किए गए थे. वहीं, 31 अक्टूबर को इस सीजन में सबसे ज्यादा 292 घटनाएं सामने आई थीं.

1 नवंबर तक देश में पराली जलाने के सबसे ज्यादा 1,514 मामले पंजाब में दर्ज किए गए थे. इसके बाद राजस्थान में 671, मध्य प्रदेश में 566, उत्तर प्रदेश में 345, उत्तराखंड में 176, हरियाणा में 42 और दिल्ली में पराली जलाने के 2 मामले सामने आए थे. जिला स्तर पर तरनतारन में पराली जलाने के सबसे ज्यादा 489 मामले दर्ज किए गए हैं. इसके बाद फिरोजपुर में 193, अमृतसर में 192, गुरदासपुर में 100 और कपूरथला में 99 मामले सामने आए हैं.

वहीं, पंजाब के कई शहरों में वायु गुणवत्ता भी खराब होने लगी है. पटियाला में वायु गुणवत्ता सूचकांक  (AQI) 231 पर पहुंच गया है. लुधियाना में AQI 214, जालंधर में 157, मंडी गोबिंदगढ़ में 153 और अमृतसर में 123 दर्ज किया गया. आयोग के सदस्य सचिव तरुण पिथोड़े ने रविवार को सात जिलों के अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की. इसमें फरीदकोट, फिरोजपुर, बरनाला, बठिंडा, पटियाला, मलेरकोटला और संगरूर के उपायुक्तों (DC), जिला मजिस्ट्रेट और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) शामिल हुए. बैठक में पराली प्रबंधन के लिए जिला प्रशासन की ओर से की गई कार्रवाई और तैयारियों की समीक्षा की गई.

वहीं, अधिकारियों को पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए. खासकर शाम के समय निगरानी तेज करने को कहा गया, क्योंकि इस दौरान खेतों में आग लगाने की घटनाओं पर नजर रखना आसान होता है. अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया कि जहां भी पराली जलाने के मामले मिलें, वहां तुरंत कार्रवाई की जाए.

वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के मानकों के मुताबिक, 0 से 50 के बीच AQI को अच्छी हवा माना जाता है. 51 से 100 तक संतोषजनक, 101 से 200 तक मध्यम, 201 से 300 तक खराब, 301 से 400 तक बेहद खराब और 401 से 500 तक गंभीर श्रेणी में रखा जाता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, हवा की गुणवत्ता  खराब होने से फेफड़ों की बीमारी, अस्थमा और दिल की बीमारी से पीड़ित लोगों को सांस लेने में परेशानी हो सकती है. इसके अलावा, इससे त्वचा, आंखों और नाक में एलर्जी की समस्या भी हो सकती है.

Share This Article