एग्रीवेट: जब भी चाय की बात होती है, तो सबसे पहले दार्जिलिंग और असम की चाय का नाम आता है. अपनी खास खुशबू और स्वाद के लिए मशहूर इन दोनों जगहों की चाय की देशभर में मांग है. लेकिन उत्तराखंड की पहाड़ियों में उगने वाली बेरीनाग चाय भी स्वाद और खुशबू के मामले में इन्हें कड़ी टक्कर देती है. अपनी खास पहचान के चलते इसे जीआई टैग भी मिल चुका है. इससे इसकी मांग बढ़ी है, लेकिन सरकारी मदद और प्रोत्साहन की कमी के कारण बेरीनाग चाय की खेती का रकबा लगातार घट रहा है.
बेरीनाग चाय की खेती उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के चौकोड़ी और बेरीनाग में की जाती है. कभी चाय का स्वाद कभी विदेशों तक मशहूर था. यहां की चाय अपनी खास खुशबू और स्वाद के लिए जानी जाती थी. इसकी मांग इतनी थी कि सात समंदर पार ब्रिटेन तक के लोग इसे पसंद करते थे. इसकी खुशबू दार्जिलिंग की चाय को भी टक्कर देती थी. लेकिन समय के साथ सरकारी उपेक्षा के कारण यहां के चाय बागान उजड़ते चले गए. आज कई पुराने चाय बागानों की जगह मकान और दूसरी इमारतें बन गई हैं.
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एक अंग्रेज अधिकारी हिल एक्सटेंशन ने बेरीनाग की जलवायु और जमीन को चाय की खेती के लिए उपयुक्त बताया था. उन्होंने इस संबंध में ब्रिटिश सरकार के सामने प्रस्ताव रखा. इसके बाद बेरीनाग में चाय बागान विकसित करने के लिए 200 एकड़ जमीन मंजूर की गई. वर्ष 1964 में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई. इसके तहत खितोली, सांगड़, बना, भट्टीगांव और ढनौली में चाय बागान लगाने के लिए जमीन आवंटित की गई. हिल एक्सटेंशन की पहल पर बेरीनाग और चौकोड़ी में चाय के बागान भी विकसित किए गए.
20वीं सदी की शुरुआत में मेजर आर. ब्लेयर ने बेरीनाग और चौकोड़ी टी स्टेट की जिम्मेदारी संभाली. उस समय चाय का उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पा रहा था. इसके बाद जॉर्ज बिलियट ने टी स्टेट खरीद लिया. वर्ष 1916 में बिलियट ने इसे जिम कॉर्बेट को सौंप दिया. हालांकि, अपने घूमने-फिरने के शौक के कारण कॉर्बेट इसे ज्यादा समय तक नहीं चला सके. बाद में उन्होंने टी स्टेट मुरलीधर पंत को सौंप दिया. पंत भी इसका लंबे समय तक संचालन नहीं कर पाए और उन्होंने इसे कुमाऊं के बड़े उद्योगपति दान सिंह बिष्ट मालदार को बेच दिया.
दान सिंह बिष्ट मालदार के हाथों में टी स्टेट आने के बाद बेरीनाग और चौकोड़ी में चाय का उत्पादन बढ़ने लगा. यहां चाय के कारखाने लगाए गए और यहां की चाय विदेशों में भेजी जाने लगी. लेकिन मालदार परिवार की अगली पीढ़ी इसका सही ढंग से रखरखाव नहीं कर सकी. धीरे-धीरे चाय बागानों की जमीन बिकने लगी और बागान उजड़ते चले गए. जहां कभी चाय की खेती होती थी, वहां अब इमारतें खड़ी हो गई हैं. वहीं, चाय की फैक्ट्रियां भी खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं.
बेरीनाग और चौकोड़ी में उगाई जाने वाली चाय का स्वाद और खुशबू काफी खास थी. यहां की चाय इंग्लैंड तक भेजी जाती थी. उस दौर में अंग्रेज इसे काफी पसंद करते थे. दावा किया जाता है कि स्वाद के मामले में यह दार्जिलिंग और असम की चाय को भी टक्कर देती थी. अंग्रेजों की पसंद को देखते हुए यहां अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए पीको फ्लावरी, विटोको स्पेशल, गोल्डन स्पेशल और पीको स्पेशल जैसे चाय के ब्रांड तैयार किए जाने लगे. इसके लिए चाय कारखानों में आधुनिक मशीनें लगाई गईं. चाय उत्पादन और प्रसंस्करण के इस काम से क्षेत्र के 500 से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ था.
एक समय बेरीनाग और चौकोड़ी में चाय के बड़े-बड़े बागान हुआ करते थे. ब्रिटिश काल और 20वीं सदी की शुरुआत में यहां चाय की खेती का काफी विस्तार था. अलग-अलग ऐतिहासिक आंकड़ों में इन बागानों का रकबा 200 से लेकर 2,000 एकड़ तक बताया गया है. लेकिन समय के साथ देखरेख की कमी और जमीन पर अतिक्रमण के कारण चाय के बागान सिमटते चले गए. अब स्थानीय स्तर पर चाय की खेती को फिर से बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं.
वर्तमान में बेरीनाग क्षेत्र में हर साल करीब 8,000 से 10,000 किलो (10 टन) तैयार चाय का उत्पादन होता है. इसकी कीमत गुणवत्ता और किस्म के आधार पर 500 से 1,500 रुपये प्रति किलो तक रहती है. ऐसे वर्तमान में बेरीनाग क्षेत्र में हर साल करीब 8,000 से 10,000 किलो (10 टन) तैयार चाय का उत्पादन होता है. इसकी कीमत गुणवत्ता और किस्म के आधार पर 500 से 1,500 रुपये प्रति किलो तक रहती है.