एग्रीवेट: राजमा का नाम सुनते ही खाने के शौकीनों के मुंह में पानी आ जाता है. देश के कई हिस्सों में राजमा-चावल खूब पसंद किया जाता है. खासकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली में इसका इस्तेमाल आम है. अलग-अलग राज्यों में राजमा की कई किस्में उगाई और खाई जाती हैं, जिनका स्वाद और बाजार भाव भी अलग होता है. इन्हीं में उत्तराखंड की मुनस्यारी सफेद राजमा खास पहचान रखती है. अपने स्वाद और खास गुणवत्ता के लिए इसे साल 2021 में GI टैग भी मिल चुका है. अभी यह ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म पर 500 रुपये किलो तक बिक रहा है.
उत्तराखंड की मुनस्यारी सफेद राजमा हिमालयी क्षेत्र की खास किस्मों में शामिल है. इसका नाम उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिला स्थित मुनस्यारी क्षेत्र के नाम पर पड़ा है. मुनस्यारी करीब 7,200 फीट की ऊंचाई पर जोहार घाटी के प्रवेश क्षेत्र में स्थित है. मुनस्यारी राजमा की खेती पारंपरिक तरीके से की जाती है. इसकी खेती और कटाई में महिला किसान स्वयं सहायता समूहों की भी बड़ी भूमिका है. इससे राजमा की ताजगी और गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है.
मुनस्यारी राजमा की खेती प्राकृतिक तरीके से की जाती है. इसमें रसायनों और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसका रंग गहरा, बनावट नरम और स्वाद हल्का व खास होता है. इसमें फाइबर भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है. यह राजमा पौधों से मिलने वाले प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का अच्छा स्रोत है. यही वजह है कि इसे अलग-अलग उम्र के लोग पसंद करते हैं. यह स्वादिष्ट होने के साथ पेट भरने वाला और पौष्टिक खाद्य भी माना जाता है.
मुनस्यारी राजमा पौधों से मिलने वाले प्रोटीन और कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट का अच्छा स्रोत है. इसमें भरपूर मात्रा में डाइटरी फाइबर पाया जाता है, जो पाचन को बेहतर रखने में मदद करता है. इसमें मौजूद पोषक तत्व ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने और दिल की सेहत के लिए फायदेमंद हो सकते हैं. यह कोलेस्ट्रॉल को कम करने में भी मदद कर सकता है. इसके अलावा, राजमा में पाए जाने वाले पोषक तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और ऊर्जा को सपोर्ट करते हैं.
मुनस्यारी राजमा में मैग्नीशियम भी पाया जाता है. यह मांसपेशियों और नसों के सामान्य कामकाज में मदद करता है. इसमें मौजूद पोषक तत्व दिमाग और याददाश्त से जुड़ी सामान्य गतिविधियों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं. संतुलित आहार का हिस्सा बनने पर राजमा हाई ब्लड प्रेशर, स्ट्रोक और हृदय रोग के जोखिम को कम करने में योगदान दे सकता है. हालांकि, इसे किसी बीमारी के इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए. ऐसे मुनस्यारी सफेद राजमा की खेती बड़े व्यावसायिक स्तर पर नहीं होती. इसे स्थानीय सीमांत किसान छोटे-छोटे खेतों में उगाते हैं. पहाड़ी इलाकों की ऊंचाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इसकी खेती का कुल रकबा भी सीमित है. मांग ज्यादा होने के बावजूद मुनस्यारी राजमा की उपलब्धता मुख्य रूप से मुनस्यारी, पिथौरागढ़ और हल्द्वानी के स्थानीय बाजारों तक ही रहती है.
सामान्य बारिश पर आधारित पहाड़ी परिस्थितियों में मुनस्यारी सफेद राजमा की औसत पैदावार करीब 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहती है. यानी एक एकड़ में करीब 4 से 6 क्विंटल तक राजमा का उत्पादन हो सकता है. किसानों के अनुसार, वर्टिकल नेट तकनीक अपनाने से प्रति नाली पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इस तकनीक से सीमित जमीन में खेती को बेहतर तरीके से करने और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल रही है.
मुनस्यारी राजमा की खेती के लिए खेत की 2 से 3 बार जुताई की जाती है. इससे मिट्टी भुरभुरी और समतल हो जाती है. इसके बाद जून-जुलाई में खरीफ सीजन के दौरान राजमा की बुवाई की जाती है. पहाड़ी क्षेत्रों में पर्याप्त नमी और मौसम को ध्यान में रखते हुए बीजों को लाइन में बोया जाता है. पौधों और कतारों के बीच उचित दूरी रखी जाती है, ताकि पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिले और खेत में हवा का सही संचार बना रहे. फसल के शुरुआती समय में खेत की निराई-गुड़ाई और जरूरत के अनुसार हल्की सिंचाई की जाती है. हालांकि, खेत में पानी जमा नहीं होने देना चाहिए. जलभराव से फसल को नुकसान हो सकता है. मुनस्यारी सफेद राजमा की फसल को तैयार होने में आमतौर पर 120 से 130 दिन का समय लगता है. फसल पकने के बाद इसकी कटाई की जाती है.