एग्रीवेट: कश्मीर में खेती का तरीका तेजी से बदल रहा है. कभी धान के लहलहाते खेतों के लिए मशहूर घाटी में अब सेब के बागों का विस्तार हो रहा है. बेहतर कमाई की उम्मीद में किसान पारंपरिक धान की खेती छोड़कर बागवानी की ओर बढ़ रहे हैं. इसका असर कश्मीर के प्रसिद्ध सुगंधित मुश्कबुदजी चावल पर भी पड़ने की आशंका है. पिछले नौ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में धान की खेती का रकबा करीब 45,700 हेक्टेयर घट गया है, जबकि दो दशकों में सेब की बागवानी का क्षेत्रफल लगभग 60 प्रतिशत बढ़ा है. दूसरी तरफ बाहरी राज्यों से चावल की आपूर्ति भी लगातार बढ़ रही है.
कृषि उत्पादन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले नौ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में धान की खेती का रकबा 3.045 लाख हेक्टेयर से घटकर 2.588 लाख हेक्टेयर रह गया है. यानी करीब 45,700 हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती कम हुई है. वहीं, पिछले दो दशकों में सेब की बागवानी का क्षेत्रफल करीब 60 प्रतिशत बढ़कर 1.73 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है. यह बदलाव किसानों की बदलती प्राथमिकताओं को दिखाता है. हालांकि, धान का रकबा घटने का मतलब यह नहीं है कि पूरी जमीन पर सेब की खेती होने लगी है. खेती में बदलाव के पीछे आर्थिक और स्थानीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर में सेब की खेती किसानों की आमदनी का प्रमुख जरिया बन चुकी है. बाजार में सेब की मांग और बेहतर कीमत मिलने की संभावना किसानों को बागवानी की ओर आकर्षित कर रही है. इसके मुकाबले धान की खेती में ज्यादा पानी, मजदूर और सिंचाई की जरूरत होती है. मौसम की अनिश्चितता और बढ़ती लागत भी किसानों के लिए चुनौती बन रही है. दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर में बाहरी राज्यों से चावल की आपूर्ति बढ़ी है. वर्ष 2022-23 में दूसरे राज्यों से 3.74 लाख टन चावल आया था, जो 2024-25 में बढ़कर 4.86 लाख टन पहुंच गया. यानी दो वर्षों में करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इससे स्थानीय धान उत्पादन के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ रही है.
कश्मीर का पारंपरिक मुश्कबुदजी चावल अपनी खास खुशबू और स्वाद के लिए प्रसिद्ध है. यह केवल एक धान की किस्म नहीं, बल्कि घाटी की कृषि विरासत और खानपान की पहचान भी है. धान की खेती का रकबा घटने से मुश्कबुदजी जैसी पारंपरिक किस्मों को संरक्षित रखने की चुनौती बढ़ सकती है. किसानों को इसकी खेती से जोड़कर रखने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीज, उचित कीमत और बेहतर बाजार उपलब्ध कराना जरूरी है. अगर किसानों को पारंपरिक सुगंधित चावल की खेती से अच्छी आमदनी मिले, तो वे इसे जारी रखने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं.
कश्मीर में मुश्कबुदजी के अलावा कामद चावल भी अपनी खास खुशबू और स्वाद के लिए जाना जाता है. इसका इस्तेमाल पारंपरिक भोजन और विशेष अवसरों पर किया जाता है. इसके अलावा जाग, नून बियोल और काव क्रीड जैसी स्थानीय धान किस्में भी घाटी की कृषि विविधता का हिस्सा हैं. इन किस्मों को बचाने के लिए बीज संरक्षण, किसानों को तकनीकी सहायता और बेहतर विपणन सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत है.