एग्रीवेट: धान की खेती के बाद किसान अलसी और मसूर जैसी फसलों की खेती कर अतिरिक्त आमदनी हासिल कर सकते हैं. बिहार सरकार का कृषि विभाग की ओर से किसानों के लिए जारी जानकारी में अलसी और मसूर की खेती की तैयारी, बुवाई, खाद-उर्वरक, सिंचाई और कटाई से जुड़ी जरूरी जानकारी दी गई है. इसके साथ ही विभाग ने मुर्गी पालन में साफ-सफाई, संतुलित आहार और समय पर टीकाकरण को लेकर भी किसानों को सावधानी बरतने की सलाह दी है.
बिहार कृषि विभाग के अनुसार, अलसी की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है. अच्छी पैदावार के लिए खेत की अच्छी तरह जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनाना चाहिए. खेत में जैविक या गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जा सकता है. अलसी के लिए 6.0 से 7.5 pH वाली मिट्टी बेहतर मानी गई है और खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था जरूरी है. अलसी को धान, गेहूं और दलहन के साथ फसल चक्र में शामिल किया जा सकता है. विभाग ने पुसा तरंग, नीलम, शरद और आस्था जैसी उन्नत किस्मों का उल्लेख किया है. बुवाई से पहले बीज उपचार करने की सलाह भी दी गई है. फसल में जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का इस्तेमाल किया जा सकता है.
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अलसी की फसल में रस्ट रोग और चेपा, इल्ली व एफिड्स जैसे कीटों से बचाव के लिए समय-समय पर निगरानी जरूरी है. रोग और कीट दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से जैविक या रासायनिक उपाय अपनाए जा सकते हैं. जब अलसी की करीब 80-90 प्रतिशत फलियां पीली हो जाएं, तब फसल की कटाई करने की सलाह दी गई है. कटाई के बाद फसल को 2-3 दिन सुखाकर मड़ाई करें और बीजों को साफ करके सुरक्षित रखें. अलसी के बीज से तेल निकाला जाता है और इसका इस्तेमाल पशु आहार व अन्य उत्पादों में भी होता है.
बिहार कृषि विभाग ने मसूर की खेती को लेकर भी किसानों को जानकारी दी है. मसूर के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी बेहतर रहती है. मिट्टी का pH 6.5 से 7.5 के बीच होना उपयुक्त माना गया है. खेत की अच्छी जुताई के साथ जैविक खाद या कंपोस्ट का इस्तेमाल करने से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है. मसूर की बुवाई रबी मौसम में अक्टूबर से नवंबर के बीच करने की सलाह दी गई है. सामान्य तौर पर प्रति हेक्टेयर 25-30 किलो प्रमाणित बीज पर्याप्त माना गया है. बीज को 3-5 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए. मसूर में ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं होती और सामान्य तौर पर 1-2 सिंचाई पर्याप्त हो सकती है. फसल करीब 100-120 दिन में तैयार होती है और अच्छी देखभाल में 8-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिल सकता है.
विभाग ने मुर्गी पालन करने वाले किसानों को भी जरूरी सावधानियां बरतने की सलाह दी है. मुर्गियों की संख्या के अनुसार शेड का आकार रखें और प्रति पक्षी कम से कम एक वर्ग फुट जगह दें. शेड की नियमित सफाई और कीटाणुनाशक का छिड़काव जरूरी है. मुर्गियों को प्रोटीन, विटामिन और खनिज तत्वों से भरपूर संतुलित आहार देना चाहिए. नवजात चूजों को विश्वसनीय पोल्ट्री फार्म से ही खरीदें और घर लाने के बाद उन्हें साफ, सूखे और गर्म स्थान पर रखें. शुरुआती दिनों में 32-35 डिग्री सेल्सियस तापमान बनाए रखने की सलाह दी गई है. चूजों को साफ पानी और हाई-प्रोटीन फीड दें. रानीखेत और न्यूकैसल जैसी बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण कराएं. यदि मुर्गी की आंखों से पानी आए, नाक से स्राव हो या वह दाना खाना बंद कर दे तो उसे तुरंत अलग कर पशु चिकित्सक से संपर्क करें.