एग्रीवेट: मध्य प्रदेश की महिला किसान शीला कुशवाह ने खेती में केमिकल खर्च खत्म करके प्राकृतिक और जैविक तरीके से खेती का बीड़ा उठाया और कामयाबी हासिल की है. वह 3 एकड़ जमीन पर केमिकल फ्री खेती कर रही हैं. वह गोबर खाद का इस्तेमाल करके मौसमी और अच्छी कीमत देने वाली सब्जियां उगाती हैं. पहले जहां वह खूब मेहनत के बाद भी 1 लाख रुपये कमाना मुश्किल हो जाता था, वहीं अब वह अकेले 3 लाख रुपये कमा रही हैं और आत्मनिर्भर बन गई हैं. उनकी अच्छी आमदनी से परिवार के आर्थिक हालात भी पहले से बेहतर हो गए हैं.
मध्य प्रदेश के जबलपुर कृषि विभाग के अनुसार मझौली विकासखंड के परसला गांव की शीला कुशवाह अन्य महिला किसानों के लिए प्रेरणा बन गई हैं. उन्होंने केमिकल फ्री ऑर्गेनिक खेती अपनाकर कम लागत में आमदनी बढ़ाई है. वे अपनी तीन एकड़ जमीन पर प्राकृतिक और जैविक तरीके से सब्जियों की खेती कर रही हैं.
शीला कुशवाह सब्जियों की खेती में गोबर खाद का उपयोग करती हैं. वे गोबर को सुखाकर और छानकर खेतों में डालती हैं. वहीं, फसलों को कीटों से बचाने के लिए नीम की पत्तियों, गोबर और गौमूत्र से नीमास्त्र तैयार करती हैं. इससे उन्हें बाजार से महंगी रासायनिक दवाइयां खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती. रासायनिक खाद और कीटनाशकों के स्थान पर जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करने से उनकी खेती की लागत भी कम हुई है.
शीला केवल सब्जियां उगाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें सीधे ग्राहकों तक भी पहुंचाती हैं. वे रविवार को जबलपुर क़ृषि मंडी हाट बाजार, सोमवार को कटंगी और गुरुवार को मझौली में दुकान लगाकर सब्जियां बेचती हैं. इसके अलावा वे महाकौशल ललित कला महाविद्यालय के पास लगने वाले जैविक हाट में भी सब्जियां लेकर पहुंचती हैं. सीधे बिक्री करने से उन्हें अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल रहा है.
अपने खेत में शीला कुशवाह और बाजार में सब्जी बेचते हुए.
शीला कुशवाह के मुताबिक प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनकी आमदनी और मुनाफे में काफी बदलाव आया है. बाजार में सामान्य तरीके से बेची जाने वाली जो सब्जी करीब 20 रुपए में बिकती है, वही उनकी जैविक सब्जी 35 से 40 रुपए तक में बिक जाती है. इस तरह उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर खर्च नहीं होने से खेती की लागत भी कम हुई है. इससे उन्हें हर महीने करीब 20-25 हजार रुपए की आमदनी हो रही है. इस हिसाब से वह सालाना 3 लाख रुपये कमाई कर पा रही हैं. जबकि, पहले 1 लाख रुपये कमाना भी मुश्किल होता था.