एग्रीवेट: 16 अक्टूबर 2026, छिंदवाड़ा: छिंदवाड़ा: डेयरी व्यवसाय से हर महीने 1 लाख की आय, ‘नमो ड्रोन दीदी’ बनकर लक्ष्मी बाई ने पेश की मिसाल – मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के बिछुआ विकासखंड के ग्राम झांमटा की श्रीमती लक्ष्मी बाई घाघरे ने खेती, पशुपालन और आधुनिक कृषि तकनीक को अपनाकर अपनी आजीविका को नई दिशा दी है। मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत स्व सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने अपनी आर्थिक गतिविधियों का विस्तार किया। आज वे सफल दुग्ध व्यवसायी, प्रगतिशील जैविक कृषक और ‘नमो ड्रोन दीदी’ के रूप में कार्य कर रही हैं। अपने प्रयासों से उन्होंने न केवल अपनी आय बढ़ाई है, बल्कि दूसरी महिलाओं के लिए भी रोजगार और आजीविका के अवसर विकसित किए हैं। कृषि क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए उन्हें प्रदेश स्तर पर प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया जा चुका है।
लक्ष्मी बाई घाघरे के लिए स्व सहायता समूह से जुड़ना आर्थिक गतिविधियों को विस्तार देने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुआ। समूह के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षण, आर्थिक सहयोग और अपनी क्षमताओं को विकसित करने का अवसर मिला। उन्होंने इस सहयोग का उपयोग आजीविका के अलग-अलग साधन विकसित करने में किया। वे स्व सहायता समूह की अध्यक्ष होने के साथ-साथ संकुल स्तरीय संगठन से भी जुड़ी हैं। इस भूमिका में वे अन्य महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उन्होंने समूह को केवल बचत तक सीमित न रखकर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर विकसित करने का माध्यम बनाया है।
लक्ष्मी बाई ने पशुपालन और दुग्ध उत्पादन को व्यवस्थित व्यवसाय के रूप में विकसित किया है। उनके पास लगभग 10 पशु हैं, जिनसे प्रतिदिन 30 से 35 लीटर दूध का उत्पादन होता है। वे दूध से घी, पनीर, दही और मिठाइयां तैयार कर बाजार में बेचती हैं। इसके अलावा, वे आसपास की महिलाओं से भी दूध एकत्रित कर डेयरी संघ को उपलब्ध कराती हैं। अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने दुग्ध उत्पादक समूह की स्थापना की है। इस समूह के माध्यम से दूसरी महिलाओं को भी दूध उत्पादन और बिक्री से आय अर्जित करने का अवसर मिल रहा है। लक्ष्मी बाई को डेयरी व्यवसाय से हर महीने लगभग 90 हजार से 1 लाख रुपये तक की आय प्राप्त हो रही है। वहीं, विभिन्न आजीविका गतिविधियों के माध्यम से उनकी वार्षिक आय 4 लाख रुपये से अधिक हो चुकी है।
लक्ष्मी बाई ने पारंपरिक खेती के अनुभव के साथ नई तकनीकों और प्राकृतिक खेती को भी अपनाया है। उन्होंने बायो इनपुट रिसोर्स सेंटर स्थापित किया है, जहां जैविक खाद और कीट नियंत्रण के लिए उपयोगी सामग्री तैयार की जाती है। वे मिश्रित और अंतर्वर्ती फसल पद्धति अपनाकर उपलब्ध कृषि भूमि का बेहतर उपयोग कर रही हैं। इसके तहत तुअर के साथ गेंदे और सोयाबीन के साथ धनिया की खेती करती हैं। इस तरह की फसल विविधीकरण पद्धति से उन्हें खेती की लागत नियंत्रित करने और अतिरिक्त आय के अवसर विकसित करने में मदद मिली है। जैविक खेती और फसल विविधीकरण के उनके प्रयास दूसरे किसानों के लिए भी उपयोगी उदाहरण हैं।
आधुनिक कृषि तकनीक अपनाने की दिशा में लक्ष्मी बाई ने एक और कदम बढ़ाया है। भारत सरकार की ‘नमो ड्रोन दीदी’ योजना के अंतर्गत चयनित होने के बाद उन्होंने ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। अब वे ड्रोन के माध्यम से खेतों में दवाइयों के छिड़काव और फसल प्रबंधन से जुड़े कार्य करती हैं। इस गतिविधि से उन्हें सालाना लगभग 70 हजार रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। ड्रोन तकनीक के उपयोग से उनके कार्यक्षेत्र का विस्तार हुआ है। साथ ही, उन्हें कृषि की आधुनिक पद्धतियों से जुड़ने और अपनी आजीविका के लिए एक अतिरिक्त आय स्रोत विकसित करने का अवसर मिला है।
लक्ष्मी बाई की गतिविधियां अब उनके व्यक्तिगत व्यवसाय तक सीमित नहीं हैं। वे जैविक खेती, पशुपालन और फसल विविधीकरण जैसे विषयों पर दूसरी महिलाओं को मार्गदर्शन देती हैं। अपने अनुभवों के माध्यम से वे महिलाओं को उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने, नई तकनीक अपनाने और आजीविका के एक से अधिक साधन विकसित करने के लिए प्रेरित करती हैं। दुग्ध उत्पादक समूह के माध्यम से भी उन्होंने महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया है। उनके प्रयासों से दूसरी महिलाओं को भी दूध उत्पादन और बिक्री के जरिए आय अर्जित करने के अवसर मिल रहे हैं।