हरियाणा में पराली जलाने पर 30 हजार तक जुर्माना, न जलाने पर अब मिलेंगे 1200 रुपये प्रति एकड़ – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 16 अक्टूबर 2026, करनाल (हरियाणा): हरियाणा में पराली जलाने पर 30 हजार तक जुर्माना, न जलाने पर अब मिलेंगे 1200 रुपये प्रति एकड़ – धान की कटाई शुरू होते ही हरियाणा में पराली प्रबंधन को लेकर कृषि विभाग सक्रिय हो गया है। जिले में खेतों का निरीक्षण कर किसानों को समझाया जा रहा है कि पराली जलाने पर उन्हें 30 हजार रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

वहीं जो किसान पराली नहीं जलाकर उसका सही प्रबंधन करते हैं, उन्हें कृषि विभाग की ओर से प्रति एकड़ 1200 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। पिछले सीजन तक यह राशि 1000 रुपये प्रति एकड़ थी, जिसे बढ़ाया गया है।

फसल अवशेष प्रबंधन के नोडल अधिकारी सचिन कंबोज ने बताया कि पराली जलाने से हवा में प्रदूषण बढ़ता है और साथ ही खेत की मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी कम होती है। उन्होंने किसानों से पुराने तरीके छोड़कर आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल करने की अपील की।

विभाग के मुताबिक जिले के सभी गांवों में सुपर सीडर, हैप्पी सीडर और रोटावेटर जैसी मशीनें किसानों के लिए उपलब्ध करा दी गई हैं। किसान इन्हें कस्टम हायरिंग सेंटर के जरिये किराए पर लेकर खेत में ही पराली को मिट्टी में मिला सकते हैं, जिसे इन-सीटू प्रबंधन कहा जाता है। इसके अलावा पराली की गांठ बनाकर उसे खेत से बाहर निकालने यानी एक्स-सीटू प्रबंधन पर भी प्रोत्साहन राशि दी जाती है।

प्रोत्साहन राशि का भुगतान फसल कटाई और सत्यापन के बाद सीधे किसान के बैंक खाते में किया जाता है। इसके लिए किसानों को अपने खेत का ब्योरा कृषि विभाग के पोर्टल पर दर्ज कराना होता है।

पिछले कुछ वर्षों में प्रोत्साहन राशि और जागरूकता अभियानों का असर भी दिखा है। राज्य में पराली जलाने के मामले वर्ष 2021 में करीब सात हजार थे, जो वर्ष 2022 में घटकर करीब साढ़े तीन हजार, वर्ष 2023 में करीब तेईस सौ और वर्ष 2024 तक घटकर करीब चौदह सौ रह गए। कृषि विभाग का कहना है कि इस साल भी मामलों में और कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है।

जिन इलाकों में अब तक मशीनें देरी से पहुंचती रही हैं, वहां किसान संगठनों की ओर से समय पर मशीनों की उपलब्धता और प्रोत्साहन राशि और बढ़ाने की मांग उठती रही है। विभाग का कहना है कि इस बार मशीनों की संख्या पहले से ज्यादा रखी गई है, ताकि किसानों को इंतजार न करना पड़े।

अक्टूबर-नवंबर का महीना पराली जलाने के सबसे ज्यादा मामलों वाला समय माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान धान की कटाई के बाद किसानों को अगली फसल, खासकर गेहूं की बुवाई के लिए खेत जल्दी खाली करना होता है। यही वजह है कि इस दौरान आग की घटनाएं बढ़ने से आसपास के शहरों की हवा में भी प्रदूषण का स्तर ऊपर चला जाता है।

कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पराली को खेत में ही जोतकर मिलाने से अगली फसल के लिए मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा भी बनी रहती है, जबकि आग लगाने से जमीन के भीतर मौजूद लाभदायक जीवाणु भी खत्म हो जाते हैं। विभाग ने जिले के सभी गांवों में किसानों के साथ बैठकें कर उन्हें यह तकनीकी पहलू भी समझाने की कोशिश की है।

इसके साथ ही विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि पराली जलाने के मामलों में जुर्माने की राशि खेत के आकार पर निर्भर करती है। छोटे किसानों की तुलना में बड़े रकबे पर पराली जलाने वालों से ज्यादा जुर्माना वसूला जाता है। अधिकारियों का कहना है कि इसका मकसद किसानों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें मशीनों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित करना है।

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