एग्रीवेट: Maharashtra Sugarcane Mills: महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ना किसानों का आंदोलन चीनी मिलों के कामकाज पर असर डाल रहा है. महाराष्ट्र में 55 चीनी मिलों में से अब तक सिर्फ 15 में ही नए सीजन की पेराई शुरू हो पाई है, जबकि कर्नाटक में विरोध के चलते किसी भी मिल में सामान्य पेराई शुरू नहीं हुई है. किसान गन्ने का बेहतर भाव देने और चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. सरकार ने किसानों की समस्याएं सुनने के लिए एक समिति बनाई है, लेकिन किसान संगठन इससे संतुष्ट नहीं हैं और उनका आंदोलन जारी है.
महाराष्ट्र में चीनी मिलों में अक्टूबर से नए पेराई सीजन की शुरुआत होती है. परंपरा के मुताबिक, 55 में से 40 मिलों में पेराई शुरू करने से पहले पूजा की जा चुकी है. हालांकि, किसानों के आंदोलन के कारण इन मिलों में नियमित रूप से काम शुरू नहीं हो पाया. बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, 8 अक्टूबर से अब तक 15 मिलों में पेराई शुरू हुई है. इन मिलों से चीनी का उत्पादन बढ़ने पर बाजार में इसकी उपलब्धता बेहतर हो सकती है और कीमतों को नीचे लाने में मदद मिल सकती है. लेकिन बाकी मिलों में कामकाज शुरू होने में हो रही देरी से गन्ने की पेराई और चीनी उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है.
कर्नाटक में स्थिति और ज्यादा प्रभावित है. यहां किसानों के विरोध की वजह से किसी भी चीनी मिल में सामान्य सीजन की पेराई शुरू नहीं हो सकी है. हालांकि, राज्य की 28 मिलों में से आठ मिलें विशेष सीजन में उगाए गए गन्ने की पेराई कर रही हैं. यह नियमित पेराई सीजन से अलग है. महाराष्ट्र और कर्नाटक देश के बड़े चीनी उत्पादक राज्य हैं. ऐसे में दोनों जगह मिलों का काम प्रभावित होने से गन्ना किसानों के साथ-साथ चीनी उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है.
दोनों राज्यों के किसान गन्ने का बेहतर दाम चाहते हैं. इसके साथ ही उनकी मांग है कि चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत बढ़ाकर 60 रुपये प्रति किलोग्राम की जाए. किसानों का कहना है कि खेती पर खर्च बढ़ रहा है, इसलिए गन्ने का मौजूदा भाव उनकी जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त नहीं है. किसानों ने अपनी मांगों को लेकर राष्ट्रीय राजमार्गों पर जाम लगाने की चेतावनी भी दी थी. इसके बाद केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रल्हाद जोशी और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिल्ली में किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की.
बैठक के बाद किसानों की मांगों पर विचार करने के लिए पूर्व नीति आयोग सदस्य रमेश चंद की अध्यक्षता में एक समिति बनाने का फैसला लिया गया. सरकार ने समिति को अधिसूचित भी कर दिया है. इसका काम किसानों की शिकायतों और मांगों पर विचार करना है.
हालांकि, समिति की रिपोर्ट जमा करने की कोई साफ समयसीमा तय नहीं की गई है. साथ ही, उसकी सिफारिशें कब लागू होंगी, इसे लेकर भी कोई साफ जानकारी नहीं है. इसी वजह से किसान संगठनों में नाराजगी बनी हुई है. उनका मानना है कि सिर्फ समिति बनाने से उनकी समस्याओं का तुरंत समाधान नहीं होगा.
गन्ने की पेराई का समय किसानों के लिए काफी अहम होता है. मिलें समय पर नहीं चलतीं, तो गन्ने की कटाई, ढुलाई और भुगतान से जुड़ी परेशानियां बढ़ सकती हैं. दूसरी ओर, मिलों में पेराई शुरू होने से चीनी की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद रहती है.
फिलहाल महाराष्ट्र और कर्नाटक में आंदोलन खत्म होने के संकेत नहीं हैं. अब सबकी नजर सरकार की समिति और किसानों की मांगों पर होने वाले अगले फैसले पर है. जब तक किसानों को अपनी मांगों पर ठोस भरोसा नहीं मिलता, तब तक चीनी मिलों का कामकाज प्रभावित रहने की आशंका बनी हुई है.