गन्ने में तना छेदक और सफेद गिडार का खतरा, टीएनएयू ने बताई दवा की सही मात्रा, इस बड़े खुलासे से मचा हड़कंप – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 14 अक्टूबर 2026, कोयंबटूर (तमिलनाडु): गन्ने में तना छेदक और सफेद गिडार का खतरा, टीएनएयू ने बताई दवा की सही मात्रा – गन्ने की फसल पर इस समय कई कीटों का दबाव देखा जा रहा है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयंबटूर के पादप संरक्षण अध्ययन केंद्र ने अक्टूबर महीने के लिए जारी अपनी ताजा सलाह में गन्ने के कई जिलों में कीट प्रकोप की जानकारी दी है और किसानों को तुरंत उपाय अपनाने को कहा है।

विरुधुनगर जिले में गन्ने की फसल में शुरुआती तना छेदक कीट का प्रकोप देखा गया है। वहीं तिरुवल्लूर, कुड्डालोर, विल्लुपुरम और अरियलूर जिलों में सफेद गिडार, क्राउन मीलीबग, पोक्का बोइंग रोग और माइट कीट की समस्या सामने आई है। सेलम जिले में अलग से सफेद गिडार का प्रकोप दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक बारिश के बाद नमी बढ़ने से इन कीटों के पनपने की रफ्तार तेज हो जाती है, इसलिए किसानों को खेत की नियमित निगरानी करते रहने की सलाह दी गई है।

विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अनुसार मानसून के बाद गन्ने के खेत में इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल दवा को 200 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रोपिकोनाजोल 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर और एक चिपकाने वाले एजेंट के साथ मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। यह मिश्रण तना छेदक और पोक्का बोइंग, दोनों पर असर करता है।

सफेद गिडार के लिए अलग से इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल को 350 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। इसके साथ ही खेत में वयस्क भृंगों को पकड़ने के लिए लाइट ट्रैप लगाने और नीम, अइलान्थस व बबूल के पेड़ों पर रात में बैठने वाले भृंगों को इकट्ठा कर नष्ट करने की सलाह दी गई है, क्योंकि यही भृंग अंडे देकर खेत में फिर से गिडार फैलाते हैं।

कुड्डालोर जिले में गन्ने की फसल में पीला पत्ता रोग भी देखा गया है। विशेषज्ञों ने कहा कि जिन खेतों में यह रोग गंभीर स्तर पर है, वहां किसानों को रैटून फसल नहीं लेनी चाहिए। इसके बजाय रोग-मुक्त गन्ने के सेट्स से नई बुवाई करें और सीओवी09356 जैसी संवेदनशील किस्मों से बचें।

विशेषज्ञों के मुताबिक पीला पत्ता रोग को काबू में रखने के लिए खेत में अनुशंसित मात्रा में ही उर्वरक डालें, सूखे और पुराने पत्तों को नियमित रूप से हटाते रहें, जिसे डिट्रैशिंग कहा जाता है, और खरपतवार नियंत्रण पर भी ध्यान दें। इन उपायों से कीट और रोग फैलने की रफ्तार को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है।

विश्वविद्यालय ने किसानों को सलाह दी है कि किसी भी दवा का इस्तेमाल करने से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारी से एक बार सलाह जरूर लें, क्योंकि खेत की मिट्टी और कीट के प्रकोप की स्थिति के अनुसार मात्रा में थोड़ा बदलाव हो सकता है। छिड़काव करते समय हाथों में दस्ताने और मुंह पर मास्क पहनने की सामान्य सावधानी बरतने की भी सलाह दी गई है।

गन्ना तमिलनाडु के कई जिलों में किसानों की मुख्य नकदी फसल है और इसकी फसल अवधि करीब एक साल तक चलती है, इसलिए शुरुआती महीनों में कीट नियंत्रण न होने पर पूरे सीजन की उपज पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तना छेदक और सफेद गिडार जैसे कीट अगर समय पर न रोके जाएं तो अगली बार रैटून फसल में भी इनका असर बना रहता है, इसलिए पहले ही प्रकोप को रोकना दूसरे साल के लिए भी फायदेमंद रहता है।

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