एग्रीवेट: Women Farmers: ग्रामिण महिलाएं अब सिर्फ खेतों में काम करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कारोबार संभालने और दूसरे किसानों को साथ लेकर आगे बढ़ने में भी अहम भूमिका निभा रही हैं. देश में महिला किसानों के ऐसे समूह तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जो मिलकर खेती से जुड़े कामों को कारोबार का रूप दे रहे हैं. एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, महिला किसानों के नेतृत्व वाली किसान उत्पादक कंपनियां कई मामलों में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं. इन कंपनियों से 20 लाख से ज्यादा महिला किसान जुड़ी हैं. रिपोर्ट में इनके कारोबार को बढ़ाने के लिए आर्थिक मदद और सरकारी स्तर पर मजबूत सहयोग देने की जरूरत भी बताई गई है.
नेशनल एसोसिएशन फॉर फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशंस (NAFPO) ने नाबार्ड के साथ मिलकर 12 अक्टूबर को दिल्ली में ‘स्टेट ऑफ द एफपीओ सेक्टर 2026’ रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश में किसान उत्पादक संगठनों यानी एफपीओ की संख्या 49,800 से ज्यादा हो गई है. इस बार की रिपोर्ट में खास तौर पर महिला किसानों की अगुवाई वाले संगठनों की स्थिति और उनके कामकाज पर ध्यान दिया गया है.
FPO ऐसे संगठन होते हैं, जिनमें किसान मिलकर काम करते हैं. इससे उन्हें बीज, खाद और दूसरी जरूरतों को पूरा करने, अपनी उपज बेचने और बाजार तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है. जब महिलाएं इन संगठनों को लीड करती हैं, तो उन्हें खेती के साथ कारोबार चलाने और फैसले लेने का भी मौका मिलता है.
रिपोर्ट में 170 महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों का सर्वे किया गया. इसके नतीजों के मुताबिक, महिला किसानों की अगुवाई वाली 80 फीसदी किसान उत्पादक कंपनियों में 600 से ज्यादा सदस्य हैं. ज्यादा किसानों के एक साथ जुड़ने से इन कंपनियों की बाजार में मोलभाव करने की ताकत बढ़ सकती है. साथ ही, बड़े स्तर पर कारोबार करने के रास्ते भी खुल सकते हैं.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि महिला किसानों की अगुवाई वाली कंपनियां बनने के बाद लंबे समय तक काम जारी रखने और मुश्किल हालात से निपटने के मामले में भी बेहतर संकेत दिखाती हैं.
उत्तर प्रदेश के महोखर की छंवर एग्रो फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड इसका एक उदाहरण है. कंपनी की बोर्ड निदेशक कविता राही पहले घर संभालती थीं, लेकिन अब वह किसान उत्पादक कंपनी को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही हैं. कंपनी में 1,280 शेयर होल्डर हैं. साल 2026 में कंपनी का कारोबार 57.12 लाख रुपये रहा, जबकि इसके कुल लेन-देन 1.33 करोड़ रुपये तक पहुंचे. कविता राही का लक्ष्य कंपनी को 20 करोड़ रुपये के कारोबार तक ले जाना है. वह चाहती हैं कि उनकी कामयाबी देखकर गांव की दूसरी महिलाएं भी कारोबार और नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालने के लिए आगे आएं.
रिपोर्ट के मुताबिक, महिला किसानों की अगुवाई वाली कंपनियों के सामने जमीन और पैसे की कमी बड़ी चुनौती है. महिलाओं के पास जमीन का मालिकाना हक करीब 13 से 14 फीसदी ही बताया गया है. जमीन अपने नाम पर न होने और पूंजी की कमी के कारण उनके लिए बैंक से कर्ज लेना, कारोबार में निवेश करना और कंपनी का विस्तार करना मुश्किल हो सकता है.
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को किसान उत्पादक कंपनियां बनाने और चलाने में मदद दी जाए. कंपनियों के फैसलों और पैसों से जुड़े मामलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए. साथ ही, महिला एफपीओ के लिए कर्ज की गारंटी और लंबे समय तक काम आने वाली आर्थिक मदद की व्यवस्था हो.
रिपोर्ट में राज्यों में एफपीओ के लिए कारोबार करना कितना आसान है, इसका भी आकलन किया गया. इसमें महाराष्ट्र पहले स्थान पर रहा, जबकि तमिलनाडु दूसरे स्थान पर पहुंच गया. मध्य प्रदेश तीसरे स्थान पर रहा. उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और राजस्थान भी पहले छह राज्यों में शामिल रहे.