एग्रीवेट: Shardiya Navratri Day 2: शारदीय नवरात्रि का त्योहार मां भवानी के भक्तों के लिए बेहद खास होता है. इस दौरान देवी के 9 स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है. नवरात्रि के दूसरे दिन देवी दुर्गा के दूसरे स्वरूप यानी मां ब्रह्मचारिणी की अराधना होती है. इस साल 12 अक्टूबर 2026, सोमवार को नवरात्रि का दूसरा दिन है. मां ब्रह्मचारिणी को तप, त्याग, धैर्य और भक्ति का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी पूजा करने से भक्तों के मन को शांति मिलती है और मुश्किल समय में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है.
मां ब्रह्मचारिणी को भक्त फूल, फल, मिश्री और चीनी का भोग लगाते हैं. अगर आप भी नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने वाले हैं, तो आगे जानिए पूजा की आसान विधि, मंत्र, भोग, शुभ रंग और माता की कथा.
मां ब्रह्मचारिणी को मां पार्वती का तप करने वाला स्वरूप माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी. उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में भी अपना संकल्प नहीं छोड़ा और पूरी श्रद्धा के साथ तप करती रहीं.
मां के इसी रूप से भक्तों को धैर्य, मेहनत और अपने लक्ष्य पर टिके रहने की सीख मिलती है. उनकी तस्वीर में एक हाथ में जप की माला और दूसरे हाथ में कमंडल दिखाई देता है. माला भक्ति और ध्यान का प्रतीक है, जबकि कमंडल सादगी और संयम का संदेश देता है.
नवरात्रि के दूसरे दिन घर पर भी मां ब्रह्मचारिणी की पूजा आसानी से की जा सकती है. इसके लिए इन बातों का ध्यान रखें.
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र का जाप करना पूजा का अहम हिस्सा माना जाता है. भक्त इस मंत्र के जरिए माता से धैर्य, मन की शांति और अपने लक्ष्य पर टिके रहने की शक्ति मांगते हैं.
12 अक्टूबर को नवरात्रि के दूसरे दिन के लिए सफेद रंग बताया गया है. सफेद रंग शांति, सादगी और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है. मां ब्रह्मचारिणी को भी अक्सर सफेद वस्त्रों में दिखाया जाता है. इसलिए इस दिन सफेद कपड़े पहनकर पूजा करना भक्तों के बीच प्रचलित परंपरा है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी के रूप में माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठिन तपस्या की थी. तपस्या के दौरान उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपना धैर्य और विश्वास नहीं छोड़ा. उनकी अटूट भक्ति और दृढ़ संकल्प के कारण उनका यह स्वरूप तप और साधना का प्रतीक माना जाता है.