एग्रीवेट: दिल्ली-एनसीआर और उत्तर-पश्चिम भारत में पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं. कुछ अध्ययनों में दावा किया गया है कि किसान सैटेलाइट की निगरानी से बचने के लिए दोपहर 3 बजे के बाद खेतों में आग लगा रहे हैं. इसे देखते हुए सरकार ने जमीनी स्तर पर निगरानी तेज करने और नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई करने को कहा है.
दरअसल, दिल्ली-एनसीआर में सितंबर के मध्य से ही हवा की गुणवत्ता खराब होने लगती है. पराली जलाने की घटनाएं सर्दियों में बढ़ने वाले प्रदूषण की प्रमुख वजहों में शामिल हैं. हर साल सर्दियों में राजधानी की हवा में धुंध और स्मॉग छा जाता है. दिवाली के आसपास पटाखे जलाने से भी प्रदूषण बढ़ता है. प्रतिबंधों के बावजूद हर साल नियमों का उल्लंघन होने की खबरें सामने आती हैं. सर्दियों में दिल्ली की हवा को खराब करने वाले प्रमुख प्रदूषकों में पीएम 2.5 शामिल है. यह बेहद छोटे कण होते हैं, जो सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं. वाहनों, उद्योगों, बिजली संयंत्रों और जैविक पदार्थों को जलाने से निकलने वाले उत्सर्जन से भी हवा में प्रदूषण बढ़ता है.
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार को हुई समीक्षा बैठक में पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए जमीनी स्तर पर निगरानी और कार्रवाई तेज करने पर जोर दिया. उन्होंने खास तौर पर दोपहर 3 बजे के बाद खेतों में लगाई जाने वाली आग पर नजर रखने के निर्देश दिए. मंत्री ने पंजाब के संगरूर, तरनतारन, अमृतसर, पटियाला और गुरदासपुर जिलों पर विशेष ध्यान देने को कहा. इसके अलावा हरियाणा के कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला और फतेहाबाद जिलों में भी निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए. इन इलाकों में फसलों की कटाई के तौर-तरीकों पर नजर रखी जाएगी, ताकि पराली जलाने की घटनाओं को रोका जा सके.
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए युद्ध स्तर पर काम करने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने कहा कि किसानों को पराली के निपटारे के लिए आसान, सुलभ और कम खर्च वाले विकल्प उपलब्ध कराए जाने चाहिए. इसके साथ ही उन्होंने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन की मशीनें जल्द से जल्द उपलब्ध कराने को कहा. शिवराज सिंह चौहान ने 15 सितंबर से 12 अक्टूबर तक के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं 53.3 फीसदी और उत्तर प्रदेश में करीब 32 फीसदी कम हुई हैं. हालांकि, राजस्थान और मध्य प्रदेश में स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है.