एग्रीवेट: 08 अक्टूबर 2026, भद्रवाह (जम्मू-कश्मीर): भद्रवाह में गेंदे की खेती से किसान की किस्मत बदली, हर साल कमा रहे चार से पांच लाख रुपये – गजोठ पंचायत के किसान रफाकत हुसैन शेख कभी परंपरागत तरीके से धान और मक्का की खेती करते थे, लेकिन आज वे भद्रवाह घाटी में गेंदे के फूलों की खेती से हर साल चार से पांच लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं।
43 वर्षीय रफाकत ने 2010 में बागवानी विभाग से मुफ्त बीज और प्रोत्साहन मिलने के बाद गेंदे की खेती शुरू की थी। पहले साल उन्हें करीब 15 हजार रुपये की आमदनी हुई, जो उनकी पुरानी सालाना कमाई लगभग पांच हजार रुपये से तीन गुना ज्यादा थी।
रफाकत आज करीब 30 कनाल किराये की जमीन पर गेंदे की खेती करते हैं। शुरुआती सालों में मिली सफलता के बाद उन्होंने धीरे-धीरे जमीन का दायरा बढ़ाया और फूलों की खेती को ही अपनी मुख्य आजीविका बना लिया।
उनकी देखादेखी गजोठ इलाके के चार से पांच सौ किसानों ने भी फूलों की खेती अपनाई है। इसी वजह से गजोठ पंचायत को अब जम्मू-कश्मीर में “गेंदे की राजधानी” के तौर पर पहचाना जाने लगा है, जबकि भद्रवाह पहले से ही लैवेंडर की खेती के लिए मशहूर है।
भद्रवाह से गेंदे के फूल हर दिन ट्रकों के जरिए पहाड़ी रास्तों से जम्मू की मंडियों तक पहुंचाए जाते हैं। इनके मुख्य खरीदारों में रघुनाथ मंदिर और बाहु किले की बावे वाली माता मंदिर शामिल हैं, जहां इन फूलों से मालाएं बनाकर पूजा-अर्चना में इस्तेमाल किया जाता है।
त्योहारी और धार्मिक मौकों पर मंदिरों में फूलों की मांग बढ़ जाती है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलने की उम्मीद रहती है। स्थानीय किसानों के मुताबिक गेंदे की खेती धान-मक्का की तुलना में कम पानी और कम समय में तैयार हो जाती है, जिससे पहाड़ी इलाके के छोटे किसानों के लिए यह फायदे का सौदा साबित हो रही है।
भद्रवाह घाटी की ऊंचाई और ठंडा मौसम पहले से ही लैवेंडर जैसी खास फसलों के लिए अनुकूल माना जाता रहा है। गेंदे की खेती ने इस पहाड़ी इलाके में परंपरागत अनाज की फसलों के साथ-साथ एक और विकल्प जोड़ दिया है, जिससे किसानों को आय के स्रोत में विविधता मिली है।
बागवानी विभाग शुरुआत में बीज और तकनीकी सहयोग देकर किसानों को इस खेती से जोड़ता है, जिसके बाद ज्यादातर किसान अपने अनुभव और स्थानीय बाजार की समझ के आधार पर खेती का विस्तार करते हैं। रफाकत की कहानी अब भद्रवाह घाटी के नए किसानों के लिए एक उदाहरण बन गई है, जो परंपरागत फसलों से हटकर फूलों की खेती में संभावनाएं तलाश रहे हैं।
पहाड़ी इलाकों में सड़क और परिवहन की दिक्कतों के बावजूद गेंदे जैसे फूल कम समय में टूटकर बाजार पहुंच जाते हैं, जिससे खराब होने का खतरा अनाज या सब्जी की तुलना में कम रहता है। यही वजह है कि भद्रवाह घाटी के कई किसान अब धीरे-धीरे अपनी जमीन का कुछ हिस्सा फूलों की खेती के लिए अलग करने लगे हैं।
स्थानीय बागवानी अधिकारियों के अनुसार भद्रवाह की ठंडी जलवायु गेंदे की गुणवत्ता और रंग दोनों के लिहाज से अनुकूल मानी जाती है, जिससे जम्मू के मंदिरों में यहां के फूलों की खासा मांग बनी रहती है। आने वाले सालों में क्षेत्र में फूलों की खेती के रकबे को और बढ़ाने की योजना पर काम किया जा रहा है, जिससे ज्यादा किसान परंपरागत फसलों से हटकर इस दिशा में आ सकें।
गांव के कई युवा भी अब इस खेती को सीखने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, ताकि वे शहर जाने के बजाय अपने गांव में रहकर ही कमाई कर सकें।