Success Story: बस्तर की मिट्टी से उभरी महिला एग्रीप्रेन्योर अपूर्वा त्रिपाठी, हर्बल उत्पादों से बना रहीं वैश्विक पहचान – एग्रीवेट

atulpradhan
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Woman Agripreneur Apurva Tripathi: छत्तीसगढ़ के कोंडागांव की अपूर्वा त्रिपाठी एक उभरती हुई महिला एग्रीप्रेन्योर हैं, जिन्होंने एम.डी. बोटैनिकल्स के माध्यम से जैविक औषधीय पौधों पर आधारित कृषि-उद्यम स्थापित किया है. उनके नेटवर्क से हजारों किसान जुड़े हैं और उन्हें बेहतर बाजार मिल रहा है. यह पहल विशेष रूप से जनजातीय महिलाओं को रोजगार और किसानों को स्थायी आय उपलब्ध करा रही है.

एक महिला एग्रीप्रेन्योर के रूप में मैं मानती हूं कि कृषि केवल आजीविका नहीं, यह हमारी विरासत है. नवाचार, सततता और सशक्तिकरण के साथ हम खेती को परिवर्तन की शक्ति बना सकते हैं- अपूर्वा त्रिपाठी, संस्थापक – एम.डी. बोटैनिकल्स, एग्रीप्रेन्योर

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कोंडागांव जिले से आने वाली अपूर्वा त्रिपाठी आज देश की उभरती हुई महिला एग्रीप्रेन्योर के रूप में पहचान बना चुकी हैं. वे एम.डी. बोटैनिकल्स की संस्थापक तथा मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म्स एंड रिसर्च सेंटर में क्वालिटी कंट्रोल प्रमुख के रूप में कार्य कर रही हैं. उनके नेतृत्व में जैविक औषधीय पौधों पर आधारित एक ऐसा कृषि-उद्यम विकसित हुआ है, जो किसानों को बेहतर आय और बाजार उपलब्ध करा रहा है. इस नेटवर्क से जुड़े हजारों किसान औषधीय पौधों की खेती के माध्यम से स्थायी आय प्राप्त कर रहे हैं.

अपूर्वा के प्रयासों से उत्पादित हर्बल उत्पाद देश-विदेश के बाजारों तक पहुंच रहे हैं और इस उद्यम का वार्षिक कारोबार लगातार बढ़ रहा है. विशेष रूप से जनजातीय महिला किसानों को उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन से जोड़कर उन्होंने ग्रामीण आजीविका को नई दिशा दी है.

बस्तर की धरती से उभरती एक नई पहचान

कोंडागांव की जनजातीय और प्राकृतिक संपदा से समृद्ध धरती पर पली-बढ़ी अपूर्वा त्रिपाठी ने बचपन से ही प्रकृति और कृषि के साथ गहरा संबंध महसूस किया. बस्तर की मिट्टी में औषधीय पौधों की प्रचुरता और पारंपरिक ज्ञान की समृद्ध विरासत ने उनके विचारों को गहराई से प्रभावित किया.

अपूर्वा त्रिपाठी ने अपनी उच्च शिक्षा बी.ए. एलएल.बी. और एलएल.एम. (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी एवं कॉर्पोरेट लॉ) में प्राप्त की. विधि के क्षेत्र में उनकी विशेष रुचि पारंपरिक ज्ञान, औषधीय पौधों और बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़ी रही.

वर्तमान में वे पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों और पादप प्रजातियों से संबंधित विधिक विषय पर पीएच.डी. कर रही हैं. इस शोध का उद्देश्य पारंपरिक औषधीय ज्ञान को संरक्षित करना और किसानों तथा समुदायों के अधिकारों को मजबूत बनाना है.

उनकी यह विधिक समझ उन्हें एक अलग पहचान देती है, क्योंकि वे केवल उद्यमी नहीं बल्कि नीति और कानून के स्तर पर भी कृषि और हर्बल उद्योग से जुड़े मुद्दों को समझती और प्रस्तुत करती हैं.

अपूर्वा की प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत उनके पिता डॉ. राजाराम त्रिपाठी हैं, जो देश के प्रसिद्ध हर्बल वैज्ञानिक और सफल किसान हैं. वर्ष 1996 में उन्होंने मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म्स एंड रिसर्च सेंटर की स्थापना की थी.

अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात कर वैश्विक पहचान प्राप्त की

आज अपूर्वा त्रिपाठी इसी विरासत को आधुनिक उद्यमिता और वैश्विक बाजार की दृष्टि से आगे बढ़ा रही हैं.

उच्च शिक्षा के बाद अपूर्वा के सामने लगभग 25 लाख रुपये प्रतिवर्ष के आकर्षक कॉर्पोरेट अवसर उपलब्ध थे. लेकिन उन्होंने इस मार्ग को छोड़कर बस्तर लौटने का बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया .

उनका मानना था कि वास्तविक विकास तब संभव है जब गांवों की क्षमता को पहचानकर उन्हें अवसर प्रदान किया जाए. इसलिए उन्होंने अपने परिवार की विरासत और स्थानीय संसाधनों को आधार बनाकर एक नए कृषि-उद्यम मॉडल की शुरुआत की.

वर्ष 2022 में स्थापित एम.डी. बोटैनिकल्स का उद्देश्य स्पष्ट था- बस्तर में उगाई जाने वाली प्रमाणित जैविक जड़ी-बूटियों को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाना.

यह उद्यम पारंपरिक कृषि को आधुनिक मूल्य श्रृंखला से जोड़ने का एक अभिनव प्रयास है. आज इस ब्रांड के अंतर्गत कई प्रकार के उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जिनमें शामिल हैं:

60 से अधिक निर्यात गुणवत्ता वाले ऑर्गेनिक उत्पाद

न्यूट्रास्यूटिकल्स और हर्बल कैप्सूल

“She Health” और “He Health” जैसे विशेष स्वास्थ्य उत्पाद

उत्पादों की गुणवत्ता पर विशेष नियंत्रण रखा जाता है

एम.डी. बोटैनिकल्स केवल एक व्यावसायिक उद्यम नहीं बल्कि महिला सशक्तिकरण का एक सशक्त माध्यम भी है.

इस संगठन की संरचना में लगभग 95 प्रतिशत नेतृत्व महिलाओं के हाथों में है, जबकि 98 प्रतिशत कार्यबल जनजातीय महिलाएं हैं.

इन महिलाओं को केवल श्रमिक के रूप में नहीं बल्कि उद्यम की साझेदार के रूप में विकसित किया गया है. उन्हें निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रशिक्षण और अवसर दिए जाते हैं:

इस पहल के माध्यम से बस्तर की महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं और उनके आत्मविश्वास तथा सामाजिक सम्मान में भी वृद्धि हो रही है.

अपूर्वा त्रिपाठी के नेतृत्व में विकसित किसान नेटवर्क ने हजारों किसानों को औषधीय पौधों की खेती से जोड़ा है.

इस मॉडल में किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रखा जाता बल्कि उन्हें सम्पूर्ण मूल्य श्रृंखला का हिस्सा बनाया जाता है.

फसल की खरीद की सुनिश्चित व्यवस्था

अपूर्वा त्रिपाठी के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सराहना मिली है. उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें प्रमुख हैं:

बेस्ट एग्री एंटरप्रेन्योर अवार्ड, 26 जनवरी 2026, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा सम्मानित

एसएचआरडी रिसर्च अवार्ड 2025, झांसी

राष्ट्रमाता जिजाबाई भोसले अवार्ड

इन सम्मानों ने उन्हें देश में जैविक कृषि और हर्बल उद्यमिता के क्षेत्र में एक अग्रणी युवा नेता के रूप में स्थापित किया है.

अपूर्वा त्रिपाठी केवल उद्यमिता तक सीमित नहीं हैं बल्कि नीति और विधिक विमर्श में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं.

सदस्य, भारतीय मानक ब्यूरो (BIS)

सलाहकार, SAMPDA NGO एवं CHAMF इंडिया सहित विभिन्न किसान एवं हर्बल संगठनों में

उनकी विधिक विशेषज्ञता पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा, किसानों के अधिकारों की रक्षा और हर्बल उद्योग में न्यायपूर्ण व्यापार व्यवस्था को मजबूत बनाने में सहायक रही है.

एक व्यापक दृष्टि: भविष्य की योजना

अपूर्वा त्रिपाठी का लक्ष्य केवल व्यापार विस्तार तक सीमित नहीं है. उनकी दृष्टि इससे कहीं अधिक व्यापक है.

छत्तीसगढ़ को भारत की हर्बल कैपिटल के रूप में स्थापित किया जाए

ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त हो

भारतीय जैविक उत्पादों को वैश्विक बाजार में मजबूत पहचान मिले

अपूर्वा त्रिपाठी आज उस नई भारतीय कृषि की प्रतिनिधि हैं, जो नवाचार, सततता और सामाजिक समावेशन पर आधारित है.

युवा, शिक्षित और दूरदर्शी नेतृत्व के साथ उन्होंने यह सिद्ध किया है कि यदि सही दृष्टि और प्रतिबद्धता हो तो कृषि क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर की सफलता प्राप्त की जा सकती है.

हर जड़ी-बूटी, हर उत्पाद और हर पहल के माध्यम से वे केवल एक ब्रांड नहीं बना रही हैं बल्कि एक ऐसे आंदोलन को आगे बढ़ा रही हैं जो किसानों, महिलाओं और ग्रामीण समुदायों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रहा है.

बस्तर की मिट्टी से उठी यह हरित धारा आज देश और दुनिया में भारतीय जैविक परंपरा की नई पहचान बन रही है.

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