Success Story: बैंगनी धान और गेहूं की खेती से किसानों की बदली तक़दीर, प्रति हेक्टेयर हो रही 1,60,000 रुपये तक की आमदनी! – एग्रीवेट

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छत्तीसगढ़ के किसान मोहन लाल चंद्राकर ने बैंगनी धान और गेहूं की जैविक खेती से नवाचार किया. एंटीऑक्सीडेंट युक्त इन फसलों से “न्यूट्री-पर्पल हार्वेस्ट” ब्रांड के तहत बेहतर आय मिली. किसान उत्पादक कंपनी के जरिए सामूहिक खेती, मूल्य संवर्धन और विपणन से प्रति हेक्टेयर 1.6 लाख रुपये तक आमदनी बढ़ी और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिला.

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के केशवा गांव के प्रगतिशील किसान मोहन लाल चंद्राकर ने कृषि क्षेत्र में एक अभिनव और प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है. 55 वर्षीय चंद्राकर, जिन्होंने MBA की शिक्षा प्राप्त की है, पिछले 15 वर्षों से खेती में सक्रिय हैं और उन्होंने अपनी दूरदर्शिता से पारंपरिक खेती को एक नई दिशा दी है. उन्होंने न केवल जैविक खेती को अपनाया, बल्कि पोषण से भरपूर बैंगनी धान और बैंगनी गेहूं जैसी विशेष फसलों की खेती को भी बढ़ावा दिया. ये फसलें अपने उच्च एंटीऑक्सीडेंट गुणों के कारण स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती हैं.

उन्होंने किसान उत्पादक कंपनी के माध्यम से किसानों को संगठित कर सामूहिक उत्पादन, मूल्य संवर्धन और विपणन का सफल मॉडल विकसित किया, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिला. ऐसे में आइए उनकी सफलता की कहानी के बारे में विस्तार से जानते हैं-

“न्यूट्री-पर्पल हार्वेस्ट” ब्रांड के अंतर्गत प्रगतिशील किसान चंद्राकर ने ऐसी फसलों को बढ़ावा दिया है, जो सामान्य फसलों से अलग और अधिक पोषणयुक्त हैं. बैंगनी धान और बैंगनी गेहूं में प्राकृतिक रूप से एंथोसाइनिन जैसे तत्व पाए जाते हैं, जो इन्हें विशिष्ट बनाते हैं. उन्होंने असम से धान की उन्नत किस्में और पंजाब से गेहूं की विशेष किस्में लाकर अपने क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुरूप सफलतापूर्वक स्थापित किया. यह नवाचार न केवल उत्पादन तक सीमित है, बल्कि इसमें बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए रणनीतिक खेती भी शामिल है.

प्रगतिशील किसान चंद्राकर ने देखा कि पारंपरिक खेती में लागत अधिक और लाभ कम होता जा रहा है. साथ ही, लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ रही थी. इसी सोच ने उन्हें पोषक और औषधीय गुणों वाली फसलों की ओर आकर्षित किया. शुरुआत में चुनौतियां आईं, जैसे बीजों की उपलब्धता, किसानों का विश्वास जीतना और बाजार बनाना, लेकिन उन्होंने धैर्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन सभी समस्याओं का समाधान किया.

‘उर्जा कृषि किसान उत्पादक कंपनी लिमिटेड’ इस मॉडल की रीढ़ है. इसके माध्यम से किसानों को एक संगठित ढांचे में लाया गया, जहां वे सामूहिक रूप से उत्पादन करते हैं. इससे बीज, खाद और अन्य संसाधनों की लागत कम होती है. साथ ही, उत्पाद का एकीकृत ब्रांडिंग और विपणन किया जाता है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलता है. यह मॉडल छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से लाभकारी साबित हुआ है.

जैविक और प्राकृतिक खेती की पद्धति

इस मॉडल में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का पूरी तरह से बहिष्कार किया गया है. इसके स्थान पर गौ-आधारित प्राकृतिक खेती को अपनाया गया है. गाय के गोबर, गोमूत्र, दूध और अन्य उत्पादों का उपयोग जैविक खाद और कीटनाशक के रूप में किया जाता है. इससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है और फसलें अधिक पौष्टिक बनती हैं. यह पद्धति कम लागत में अधिक उत्पादन सुनिश्चित करती है.

फसल की विशेषताएं और स्वास्थ्य लाभ

बैंगनी धान और गेहूं की सबसे बड़ी विशेषता उनका उच्च पोषण मूल्य है. इनमें एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं. ये फसलें हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों के जोखिम को कम करने में सहायक मानी जाती हैं. इसके अलावा, ये मानसिक तनाव को कम करने और संपूर्ण स्वास्थ्य सुधार में भी मदद करती हैं.

चंद्राकर ने केवल उत्पादन तक ही सीमित न रहकर मूल्य संवर्धन पर भी ध्यान दिया. बैंगनी धान से चावल, आटा और अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं, जबकि बैंगनी गेहूं से विशेष आटा और स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद तैयार किए जाते हैं. इन उत्पादों को ब्रांडिंग के साथ बाजार में उतारा जाता है, जिससे उनकी पहचान बढ़ती है और ग्राहकों का विश्वास मजबूत होता है.

इस मॉडल ने किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है. बैंगनी गेहूं से प्रति हेक्टेयर लगभग 87,500 रुपये और बैंगनी धान से लगभग 1,60,000 रुपये तक की आय प्राप्त हो जाती है. लाभ-लागत अनुपात भी काफी बेहतर रहता है, जिससे यह मॉडल आर्थिक रूप से अत्यंत सफल साबित हुआ है. इससे किसानों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है और वे आत्मनिर्भर बने हैं.

जैविक खेती के इस मॉडल ने पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है. रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और जल प्रदूषण कम होता है. साथ ही, जैव विविधता को बढ़ावा मिलता है और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बना रहता है.

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