एग्रीवेट: महाराष्ट्र में सूखे की बढ़ती चिंता के बीच कृषि विभाग पानी की ज्यादा जरूरत वाली फसलों पर निर्भरता कम करने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए तिलहन और दलहन की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा. इसी मकसद से विभाग 22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक एक महीने का ‘खेत बचाओ अभियान’ शुरू करने जा रहा है. वहीं, कृषि विशेषज्ञों ने कम पानी वाले इलाकों में ज्वार, बाजरा, दलहन और तिलहन की खेती को बढ़ावा देने की सलाह दी है.
राज्य के कृषि आयुक्त सूरज मंधारे ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि इस अभियान में तिलहन और दलहन की खेती पर खास ध्यान दिया जाएगा. इसके अलावा मिट्टी की सेहत सुधारने, खाद का संतुलित इस्तेमाल करने, प्राकृतिक खेती अपनाने और पानी बचाने के तरीकों को भी बढ़ावा दिया जाएगा. क्योंकि महाराष्ट्र में सूखे का असर बढ़ता जा रहा है. राज्य की 358 तहसीलों में से 305 तहसीलें सूखे की चपेट में हैं. कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, फसल कटाई के शुरुआती आंकड़ों से संकेत मिलता है कि हजारों किसानों की फसल 50 फीसदी से ज्यादा खराब हो सकती है. मराठवाड़ा, विदर्भ और पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में हालात ज्यादा गंभीर हैं. अब रबी सीजन की फसलों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है.
सूखे के असर को कम करने के लिए राज्य सरकार ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसानों को तिलहन और ज्वार की खेती के लिए प्रोत्साहित करेगी. कृषि विभाग के अधिकारी ने बताया कि जहां पानी उपलब्ध है, वहां किसानों को इन फसलों की बुवाई करने की सलाह दी जाएगी. इससे अगर फसल से अच्छी पैदावार नहीं भी मिलती है, तो कम से कम पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था हो सकेगी.
मराठवाड़ा, विदर्भ और पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में फसलों की विविधता बढ़ाना खास तौर पर जरूरी है. इन इलाकों में बारिश अनियमित होने और भूजल स्तर गिरने के कारण किसानों को बार-बार फसल नुकसान का सामना करना पड़ता है. ऐसे में कम पानी में उगने वाली फसलों को बढ़ावा देना किसानों के लिए मददगार हो सकता है. वहीं, कृषि विशेषज्ञों ने कम पानी वाले इलाकों में ज्वार, बाजरा, दलहन और तिलहन की खेती को बढ़ावा देने की सलाह दी है. हालांकि, कौन-सी फसल किस इलाके के लिए बेहतर होगी, यह वहां की मिट्टी, बारिश और बाजार में उसकी मांग पर निर्भर करेगा. विशेषज्ञों का कहना है कि फसलों का चुनाव पानी की उपलब्धता के हिसाब से करना जरूरी है.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के एक हालिया आकलन में भी कई राज्यों में फसलों की पानी की जरूरत और उपलब्ध जल संसाधनों के बीच अंतर सामने आया है. इसमें महाराष्ट्र भी शामिल है. ICAR ने सुझाव दिया है कि स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से ऐसी फसलों को बढ़ावा दिया जाए, जिनमें अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत होती है. इसके साथ ही सिंचाई के बेहतर तरीकों और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक खेती करने पर भी जोर दिया गया है.
मराठवाड़ा पानी फाउंडेशन के अध्यक्ष नरहरि शिवपुरे ने कहा कि किसानों के लिए फसल बदलने का फैसला सिर्फ पानी की उपलब्धता पर निर्भर नहीं करता. उन्होंने बताया कि जब पानी पर्याप्त होता है, तो किसान गन्ने की खेती को प्राथमिकता देते हैं. इसकी एक वजह यह है कि चीनी मिलें किसानों को फसल की ढुलाई और दूसरी व्यवस्थाओं में मदद करती हैं. साथ ही, गन्ने के लिए उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) की व्यवस्था भी है. इसके उलट, दलहन और अनाज की खेती में किसानों को कीमत और फसल बेचने को लेकर ज्यादा अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है. इसलिए किसानों को इन फसलों की ओर ले जाना आसान नहीं है.
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ जागरूकता अभियान चलाने से फसल विविधीकरण को सफल नहीं बनाया जा सकता. किसानों को फसल की खरीद की भरोसेमंद व्यवस्था, बाजार तक बेहतर पहुंच और आर्थिक प्रोत्साहन देना भी जरूरी है. इससे किसान पारंपरिक फसलों के बजाय कम पानी में उगने वाली दूसरी फसलों को अपनाने के लिए तैयार हो सकते हैं.