लाल बहादुर शास्त्री का सादगी से शिखर तक सफर, अन्न संकट में खुद बने मिसाल.. किसानों-जवानों को दिया सम्मान – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: Lal Bahadur Shastri Jayanti: 2 अक्टूबर को देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के साथ पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती भी मना रहा है. 1904 में मुगलसराय में जन्मे शास्त्री जी का जीवन सादगी, ईमानदारी और देशसेवा के लिए जाना जाता है. प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन 1965 के युद्ध, गंभीर खाद्यान्न संकट और किसानों का मनोबल बढ़ाने के लिए दिया गया ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा आज भी उनके योगदान की याद दिलाता है.

खास बात यह है कि जब देश खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा था, तब शास्त्री जी ने केवल जनता से त्याग करने की अपील नहीं की, बल्कि पहले अपने परिवार में इसका पालन कराया. उन्होंने लोगों से सप्ताह में एक वक्त का भोजन छोड़ने की अपील की, ताकि संकट के दौर में अनाज की खपत कम की जा सके.

लाल बहादुर शास्त्री  का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था. उनके पिता स्कूल शिक्षक थे और शास्त्री जी जब करीब डेढ़ साल के थे, तभी उनका निधन हो गया. इसके बाद उनकी मां ने तीन बच्चों की जिम्मेदारी संभाली. आर्थिक कठिनाइयों के बीच पले-बढ़े शास्त्री जी ने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और देश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया.

1965 में देश गंभीर खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था. खाद्यान्न की कमी के बीच शास्त्री जी ने देशवासियों से सप्ताह में कम से कम एक बार एक भोजन छोड़ने की अपील की. इस अपील का उद्देश्य उपलब्ध अनाज की खपत को कम करना  और संकट से निपटने में मदद करना था. शास्त्री जी ने पहले अपने परिवार पर इसका प्रयोग किया. उनके परिवार ने शाम का भोजन छोड़कर देखा कि क्या इस तरह की व्यवस्था संभव है. इसके बाद उन्होंने देशवासियों से भी इसी तरह सहयोग करने की अपील की. कई जगह लोगों और भोजनालयों ने भी इस पहल का समर्थन किया.

खाद्यान्न संकट  का स्थायी समाधान केवल कम खाना नहीं, बल्कि अनाज का उत्पादन बढ़ाना भी था. शास्त्री जी ने कृषि उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया और किसानों का मनोबल बढ़ाने के लिए ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया. यह नारा 1965 के युद्ध और खाद्यान्न संकट के दौर में सामने आया और सैनिकों के साथ किसानों के योगदान को राष्ट्रीय महत्व दिया. शास्त्री जी ने कृषि उत्पादन बढ़ाने के संदेश को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा. उनके बारे में उपलब्ध विवरणों में बताया गया है कि उन्होंने अपने सरकारी आवास के लॉन में भी खेती को बढ़ावा दिया और लोगों को अधिक खाद्यान्न उत्पादन के लिए प्रेरित किया.

1965 के युद्ध के दौरान देश की सुरक्षा में सैनिकों और खाद्य जरूरतों को पूरा करने में किसानों की भूमिका दोनों महत्वपूर्ण थीं. इसी संदर्भ में शास्त्री जी का ‘जय जवान, जय किसान’ नारा राष्ट्रीय पहचान बना. बाद में इसमें ‘जय विज्ञान’ और ‘जय अनुसंधान’ जैसे शब्द भी जोड़े गए. लाल बहादुर शास्त्री का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सार्वजनिक जीवन में सादगी के साथ कठिन परिस्थितियों में व्यक्तिगत उदाहरण देकर लोगों से सहयोग मांगा जा सकता है. उनकी 122वीं जयंती पर देश उनके योगदान, त्याग और किसानों-सैनिकों के प्रति उनके संदेश को याद कर रहा है.

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