भाकृअनुप अल्मोड़ा ने विकसित कीं 5 फसलों की 8 उन्नत किस्में, मक्का से धान तक की वैरायटी शामिल; जानें खासियत – एग्रीवेट

atulpradhan
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एग्रीवेट: 19 सितंबर 2026, भोपाल: भाकृअनुप अल्मोड़ा ने विकसित कीं 5 फसलों की 8 उन्नत किस्में, मक्का से धान तक की वैरायटी शामिल; जानें खासियत – भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के वैज्ञानिकों ने 5 फसलों की 8 उन्नतशील किस्में विकसित करने में सफलता प्राप्त की है। इनमें मक्का की वीएल हिमाद्री (एफएच 3879), जौ की वीएलबी 177, मसूर की वीएल मसूर 538 और वीएल मसूर 535, सोयाबीन की वीएल सोया 106 और वीएल सोया 107 तथा धान की वीएल धान 71 और वीएल धान 160 शामिल हैं। इन किस्मों को राज्य किस्म विमोचन समिति की 10 सितंबर 2026 को हुई बैठक में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक वर्षा आश्रित परिस्थितियों में समय पर बुवाई के लिए विमोचित किया गया।

इस संकर मक्का प्रजाति का विकास वी 495 व वी 461 के संयोजन से किया गया है। यह सामान्य मक्का की अगेती प्रजाति है, जो 90-95 दिन में परिपक्व होती है। राज्य-स्तरीय परीक्षणों में इसकी औसत उपज 4,864 किलोग्राम/हेक्टेयर रही, जो चेक प्रजाति वीएमएच 45 से 15.21 प्रतिशत अधिक थी। इस प्रजाति ने टर्सिकम व मेडिस पर्ण झुलसा के लिए मध्यम प्रतिरोधकता भी प्रदर्शित की। इसे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक वर्षा आश्रित परिस्थितियों में समय पर बुवाई के लिए विमोचन की संस्तुति की गई है।

वीएलबी 177 जौ की नई उच्च उपज देने वाली द्वि-उद्देशीय किस्म है, जिसे भाकृअनुप-विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा ने चयन पद्धति से विकसित किया है। उत्तराखंड राज्य परीक्षणों के तीन वर्षों में इसने 1,730 किलोग्राम/हेक्टेयर औसत दाना उपज दी, जो चेक किस्मों वीएलबी 118, वीएलबी 130 और यूपीबी 1008 की तुलना में क्रमशः 7.5, 10.3 और 23.9 प्रतिशत अधिक थी। उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों के द्वि-उद्देशीय परीक्षणों में वीएलबी 177 में 70-75 दिनों पर चारा कटाई के बाद 27.7 क्विंटल दाना तथा 107.7 क्विंटल हरे चारे की उपज देने की क्षमता पाई गई। यह किस्म पीला एवं भूरा रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोधी पाई गई। इसे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की समय पर बोई गई जैविक वर्षा आधारित परिस्थितियों के लिए विमोचित किया गया।

वीएल मसूर 538 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में समय पर बोई जाने वाली वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित बड़े दाने वाली मसूर की उन्नत किस्म है। इसकी औसत उपज क्षमता 1,150 किलोग्राम/हेक्टेयर है और यह 155-160 दिनों में परिपक्व होती है। इसके बीज में 23.47 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। राज्य स्तरीय परीक्षणों में तीन वर्षों के दौरान वीएल मसूर 538 ने उकठा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी प्रतिक्रिया प्रदर्शित की। यह किस्म उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के वर्षा आधारित एवं जैविक उत्पादन के लिए उपयुक्त होने के साथ उच्च पोषण गुणवत्ता वाली मसूर के रूप में किसानों के लिए उपयोगी विकल्प है।

वीएल मसूर 535 भी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में समय पर बोई जाने वाली वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित बड़े दाने वाली मसूर की उन्नत किस्म है। इसकी औसत उपज क्षमता 1,202 किलोग्राम/हेक्टेयर है और यह 155-160 दिनों में परिपक्व होती है। इसके बीज में 24.91 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। राज्य स्तरीय परीक्षणों में तीन वर्षों के दौरान वीएल मसूर 535 ने उकठा रोग के प्रति प्रतिरोधी प्रतिक्रिया प्रदर्शित की। यह किस्म उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की वर्षा आधारित एवं जैविक खेती के लिए उपयुक्त है।

वीएल सोया 106 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित सोयाबीन की उन्नत किस्म है। इसका पेडिग्री VLS 75/VLS 59 है और इसकी औसत उपज 1,649 किलोग्राम/हेक्टेयर है। यह किस्म 115-120 दिनों में परिपक्व होती है तथा पौधों की औसत ऊंचाई 80-85 सेंटीमीटर रहती है। इसके 100 बीजों का वजन 14.50 ग्राम है। खेत परिस्थितियों में परीक्षण के दौरान वीएल सोया 106 ने FLS के प्रति प्रतिरोधता प्रदर्शित की है। यह किस्म उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त है।

वीएल सोया 107 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित सोयाबीन की उन्नत किस्म है। इसका पेडिग्री VLS 63/Himso 1685 है और इसकी औसत उपज 1,700-1,800 किलोग्राम/हेक्टेयर है। यह किस्म 115-120 दिनों में परिपक्व होती है और पौधों की औसत ऊंचाई 70-75 सेंटीमीटर रहती है। इसके 100 बीजों का वजन 14.95 ग्राम है। खेत परिस्थितियों में परीक्षण के दौरान वीएल सोया 107 ने FLS रोग के प्रति प्रतिरोधी प्रतिक्रिया प्रदर्शित की है। यह किस्म उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त है।

वीएल धान 71 (वीएल 32471, आईईटी 28213) को उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों और घाटियों की सिंचित रोपाई जैविक परिस्थितियों के लिए जारी किया गया है। यह लंबी-पतली धान की प्रजाति है। इसके छिलका रहित दाने की लंबाई 7.32 मिमी और लंबाई-चौड़ाई अनुपात 3.53 है। इसे भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा में खजीया धान/वीएल 30424 से विकसित किया गया है।

यह प्रजाति पत्ती एवं बाली झौंका (स्कोर 1-3), भूरी चित्ती (स्कोर 3-4) और दानों का बदरंगपन (स्कोर 0-1) के लिए प्रतिरोधी है। वहीं तनाबेधक एवं पत्ती लपेटक (स्कोर 0-3) के लिए भी प्रतिरोधी पाई गई है। इसमें 78 प्रतिशत छिलका उतारने की प्रतिशतता, 69 प्रतिशत कुटाई/प्रसंस्करण की प्रतिशतता, 54 प्रतिशत साबुत चावल की प्राप्ति और 21.06 प्रतिशत मध्यवर्ती एमाइलोज सामग्री है। इसके पौधों की ऊंचाई 80-85 सेंटीमीटर और पकने की अवधि 125-130 दिन है। जैविक परिस्थितियों में तीन वर्षों के परीक्षण के दौरान इसकी औसत उपज 3,609 किलोग्राम/हेक्टेयर रही। इसने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सर्वोत्तम चेक पंत धान 26 से 21.50 प्रतिशत तथा विवेक धान 62 की तुलना में 22.30 प्रतिशत का उपज लाभ दिखाया है।

वीएल धान 160 (वीएल 20986, आईईटी 30525) को वर्षाश्रित उपराऊ जेठी धान में जैविक परिस्थितियों में बोई जाने के लिए विमोचित किया गया है। जैविक परिस्थितियों में इसकी औसत उपज 2,321 किलोग्राम/हेक्टेयर देखी गई है, जो मानक प्रजाति विवेक धान 154 की तुलना में 18.37 प्रतिशत तथा वीएल धान 156 की तुलना में 10.78 प्रतिशत अधिक है। इस किस्म को वीएल 7620/वीएल 8801 के संकरण से विकसित किया गया है। इसके पौधों की ऊंचाई 90-95 सेंटीमीटर है। प्राकृतिक स्थिति में यह पत्ती एवं बाली झौंका (स्कोर 1-3), भूरी चित्ती (स्कोर 3-4), पर्णच्छद विगलन (स्कोर 1), पर्णच्छद अंगमारी (स्कोर 3), आभासी कण्ड (स्कोर 0-1), पत्ती लपेटक और तनाबेधक (स्कोर 0-3) के खिलाफ प्रतिरोधी पाई गई है।

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