HTBt Cotton: किसानों में तेजी से बढ़ा HTBt कपास का चलन, बिना मंजूरी 72 लाख एकड़ में खेती का दावा – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: HTBt Cotton Farming: कपास के खेत में खरपतवार साफ करने के लिए किसान को पहले मजदूरों का इंतजार करना पड़ता था. मजदूर मिल भी जाएं तो निराई-गुड़ाई का खर्च हजारों रुपये तक पहुंच जाता है. ऐसे में कई किसान ऐसा बीज इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसके जरिए खेत में खरपतवार पर दवा का छिड़काव करना आसान हो जाता है. लेकिन इस बीज को लेकर बड़ा सवाल यह है कि इसे भारत में अभी मंजूरी ही नहीं मिली है. इसके बावजूद एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, देश में इसकी खेती बड़े पैमाने पर हो रही है.

साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर यानी SABC की नई फील्ड स्टडी के मुताबिक, खरीफ सीजन 2025-26 में देश में करीब 65 से 72 लाख एकड़ में बिना मंजूरी वाली HTBt कपास उगाई गई. यह देश में कपास की कुल खेती का करीब 24 से 30 प्रतिशत हिस्सा बताया गया है. इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के कपास उगाने वाले 16 जिलों को शामिल किया गया. इसके लिए किसानों से बातचीत, बीज की सप्लाई और बिक्री की पड़ताल के साथ कपास के नमूनों की लैब में जांच भी की गई.

HTBt कपास असल में Bt कपास का ही एक ऐसा रूप है, जिसमें खरपतवार नष्ट करने वाली दवा के प्रति सहनशीलता वाला गुण भी जोड़ा गया है. इसकी वजह से किसान खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल कर सकते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, यही सुविधा किसानों को इसकी ओर खींच रही है. मजदूरों से खेत की निराई कराने में एक एकड़ पर करीब 12,000 से 15,000 रुपये खर्च हो सकते हैं. वहीं ग्लाइफोसेट से खरपतवार नियंत्रण का खर्च करीब 750 से 850 रुपये प्रति एकड़ बताया गया है.

स्टडी के मुताबिक महाराष्ट्र में करीब 58 प्रतिशत किसान HTBt कपास अपना रहे हैं. तेलंगाना में यह आंकड़ा करीब 66 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 49 प्रतिशत है. रिपोर्ट के अनुसार, बिना सरकारी मंजूरी वाले HTBt बीज का बाजार भी तेजी से बढ़ा है और अब यह करीब 820 से 880 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. वहीं, 2022 से 2026 के बीच कानूनी Bollgard-II कपास के बीज की बिक्री में 22.3 प्रतिशत की कमी आने की बात कही गई है.

स्टडी में कहा गया है कि, किसान केवल अपनी मर्जी से बिना मंजूरी वाले बीज की ओर नहीं जा रहे हैं. मजदूरों की कमी और खेती में बढ़ती लागत इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है. खासकर कपास के खेत में बार-बार खरपतवार निकालने के लिए मजदूरों की जरूरत पड़ती है. FSII के चेयरमैन अजय राणा के मुताबिक, किसानों के सामने जिस तकनीक की जरूरत है, वह उन्हें आधिकारिक तौर पर उपलब्ध नहीं हो पा रही है. ऐसे में कुछ किसान अनौपचारिक बाजार से बीज खरीद रहे हैं.

HTBt कपास का मुद्दा ऐसे समय सामने आया है, जब देश में कपास का उत्पादन भी घट रहा है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 में कपास का उत्पादन करीब 3.52 करोड़ गांठ था, जो 2025-26 में अनुमानित 2.91 करोड़ गांठ रह गया. यानी करीब 17.5 प्रतिशत की कमी आई है. इसी दौरान कपास की उत्पादकता भी 451 किलो प्रति हेक्टेयर से घटकर 431 किलो प्रति हेक्टेयर रह गई. सरकार ने इसके पीछे कम रकबा, असमान बारिश, ज्यादा तापमान, कीट और रोग जैसी कई वजहें बताई हैं. कुछ किसान ज्यादा कमाई वाली दूसरी फसलों की ओर भी जा रहे हैं. इन समस्याओं से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने 5,659 करोड़ रुपये के मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी को मंजूरी दी है.

रिपोर्ट में ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल के बढ़ने की बात भी कही गई है. इसके मुताबिक, 2024-25 में करीब 27,721 किलोलीटर ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल हुआ था. 2025-26 में यह बढ़कर 35,642 किलोलीटर हो गया. यानी एक साल में इसके इस्तेमाल में करीब 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. रिपोर्ट का कहना है कि कुछ जगहों पर ग्लाइफोसेट बड़ी मात्रा में बिना आधिकारिक चैनल के भी बेचा जा रहा है.

हालांकि, भारत में HTBt कपास को अभी सरकारी मंजूरी नहीं मिली है. इसलिए किसानों को बीज खरीदते समय सावधानी बरतनी चाहिए. बीज लेने से पहले यह जरूर जांच लें कि उसे सरकार की मंजूरी है या नहीं और बीज किसी भरोसेमंद जगह से ही खरीदें.

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