कर्नाटक में मूंगफली की टिक्का पत्ती धब्बा और रतुआ रोग का खतरा, कृषि मौसम सलाह जारी – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 21 सितंबर 2026, बेंगलुरु: कर्नाटक में मूंगफली की टिक्का पत्ती धब्बा और रतुआ रोग का खतरा, कृषि मौसम सलाह जारी – कर्नाटक में मूंगफली की फसल पर टिक्का पत्ती धब्बा (लीफ स्पॉट) और रतुआ (रस्ट) रोग फैलने का खतरा बढ़ गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और कृषि मौसम इकाई (AMFU) की 18 सितंबर को जारी संयुक्त सलाह में किसानों को समय रहते छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

सलाह के मुताबिक मूंगफली में टिक्का पत्ती धब्बा और रतुआ रोग को रोकने के लिए क्लोरोथैलोनिल (कवच) दवा का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए। यह छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर दो बार करने की सलाह दी गई है, ताकि रोग का चक्र पूरी तरह टूट जाए।

बुलेटिन में बताया गया है कि पत्तियों पर गोल भूरे धब्बे और तने पर जंग जैसे निशान दिखते ही किसानों को तुरंत छिड़काव शुरू कर देना चाहिए, ताकि रोग पूरे खेत में न फैले और उपज पर असर कम से कम हो। नमी ज्यादा रहने वाले मौसम में यह रोग तेजी से फैलता है, इसलिए खेत की लगातार निगरानी जरूरी बताई गई है।

उसी बुलेटिन में कपास की फसल में थ्रिप्स और तेला (लीफ हॉपर) कीट के लिए फिप्रोनिल 5 एससी दवा का 250 मिली प्रति 250 लीटर पानी प्रति एकड़ की दर से छिड़काव सुझाया गया है। अनार में जीवाणु झुलसा रोग के लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लिन सल्फेट 0.5 ग्राम प्रति लीटर के साथ कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़कने को कहा गया है।

सूरजमुखी में सिर छेदक कीट (हेड बोरर) के लिए स्पिनोसैड 45.5% एससी दवा का 0.1 मिली प्रति लीटर या एचएएनपीवी 100 एलई का 2 मिली प्रति लीटर पानी में छिड़काव करने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि दवा का छिड़काव हमेशा सुबह या शाम के समय करना चाहिए, जब धूप तेज न हो, ताकि दवा का असर बेहतर रहे।

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक फफूंदनाशी दवाओं का असर तभी पूरा मिलता है जब पत्तियों की दोनों सतहों — ऊपर और नीचे — पर अच्छी तरह छिड़काव किया जाए, क्योंकि टिक्का रोग के धब्बे अक्सर पत्ती के निचले हिस्से से शुरू होते हैं। बुलेटिन में यह भी सलाह दी गई है कि छिड़काव के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी साफ हो और दवा को सही अनुपात में ही घोला जाए, क्योंकि जरूरत से ज्यादा या कम मात्रा में दवा का असर घट सकता है। खेत में रोग के लक्षण दिखने के तुरंत बाद पड़ोसी खेतों में भी सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है, क्योंकि फफूंद जनित रोग हवा के जरिए तेजी से पास के खेतों में फैल सकते हैं।

बुलेटिन में यह भी बताया गया है कि छिड़काव के दो-तीन दिन के भीतर अगर तेज बारिश हो जाए, तो दवा का असर कमजोर पड़ सकता है, ऐसी स्थिति में दोबारा हल्का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि लगातार एक ही दवा का इस्तेमाल करने से रोग में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, इसलिए दो-तीन छिड़काव के बाद दवा का समूह बदलने की सलाह दी जाती है। किसानों को सुझाव दिया गया है कि वे नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विस्तार अधिकारी से संपर्क कर अपने इलाके की सही सिफारिश की पुष्टि जरूर कर लें।

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