एग्रीवेट: 10 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: केंद्र ने दलहन के प्रमाणित बीज पर सब्सिडी बढ़ाकर की 100 प्रतिशत, किसानों को ₹12,000 प्रति क्विंटल तक लाभ – केंद्र सरकार ने दलहन फसलों तुअर, उड़द और मसूर के प्रमाणित बीज पर मिलने वाली सब्सिडी को बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दिया है। इससे किसानों को प्रति क्विंटल अधिकतम ₹12,000 तक की मदद मिलेगी, ताकि महंगे बीज की वजह से किसान प्रमाणित किस्मों से मुंह न मोड़ें।
यह बढ़ोतरी दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के तहत की गई है। महाराष्ट्र के कृषि मंत्री दत्तात्रेय भरणे ने इस साल जुलाई में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर सब्सिडी 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत करने का आग्रह किया था। उनका तर्क था कि बीज की ऊंची लागत के चलते किसान प्रमाणित बीज कम अपना रहे थे, जिसका असर पैदावार पर पड़ रहा था। केंद्र ने 28 अगस्त को संशोधित दिशानिर्देश जारी कर दिए।
नई दरों के मुताबिक पिछले पांच साल के भीतर जारी की गई किस्मों में तुअर, उड़द और मसूर के बीज की पूरी लागत यानी 100 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलेगी, जिसकी अधिकतम सीमा ₹12,000 प्रति क्विंटल रखी गई है। चने और बाकी दलहन फसलों के लिए यह सब्सिडी 75 प्रतिशत या अधिकतम ₹6,000 प्रति क्विंटल तक है, जो भी रकम कम हो। पांच से दस साल पुरानी किस्मों पर तुअर, उड़द और मसूर को 75 प्रतिशत या ₹9,000 प्रति क्विंटल तक, और चने व बाकी दलहन को 50 प्रतिशत या ₹4,000 प्रति क्विंटल तक सब्सिडी तय की गई है।
संशोधित प्रावधान 28 अगस्त 2026 से लागू हैं और यह दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के 2026-27 से 2030-31 तक के दिशानिर्देशों का हिस्सा हैं। मंत्री ने किसानों से अपील की थी कि आने वाले रबी सीजन में चना बोने वाले किसान इस बढ़ी हुई सब्सिडी का फायदा उठाएं। अभी देश के ज्यादातर हिस्सों में रबी की बुवाई शुरू होने वाली है, इसलिए किसानों के पास प्रमाणित बीज खरीदने और इस राहत का लाभ लेने का सही समय है।
योजना के तहत खेतों की सही पैमाइश के लिए “कृषि मैपर” तकनीक के इस्तेमाल पर प्रति हेक्टेयर ₹30 की अलग सहायता भी जोड़ी गई है। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि प्रमाणित बीज अपनाने से न सिर्फ पैदावार बढ़ती है, बल्कि बीज-जनित बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है। किसान अपने जिले के कृषि विभाग या सहकारी समितियों के माध्यम से प्रमाणित बीज के लिए आवेदन कर सकते हैं।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन का मुख्य मकसद देश में तुअर, उड़द, मसूर, चना और मूंग जैसी दलहन फसलों का उत्पादन बढ़ाना है, ताकि आने वाले वर्षों में इनकी आयात पर निर्भरता कम हो सके। बीज निगम और राज्य कृषि विभागों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे समय पर प्रमाणित बीज किसानों तक पहुंचाएं, ताकि सब्सिडी का फायदा बुवाई के मौसम में ही मिल सके। कृषि मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक राज्यों से भी कहा गया है कि वे बीज की मांग का सही आकलन कर समय से पहले केंद्र को भेजें, जिससे किसानों को बुवाई के वक्त बीज की कमी का सामना न करना पड़े।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रमाणित बीज की ऊंची शुरुआती लागत ही सबसे बड़ी वजह रही है, जिसके चलते कई किसान सालों पुराने घरेलू बीज का इस्तेमाल करते रहते हैं। घरेलू बीज में उपज क्षमता धीरे-धीरे घटती जाती है, जबकि प्रमाणित और नई किस्मों के बीज में कीट-रोग झेलने की क्षमता भी ज्यादा होती है। सब्सिडी बढ़ने से उम्मीद है कि अगले कुछ वर्षों में प्रमाणित बीज अपनाने वाले किसानों की संख्या में बढ़ोतरी होगी।